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सांस्कृतिक हमला
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आप चाहते हैं
कि आपके मकान में
चारों तरफ से
हवा ,प्रकाश आते रहें
तो मेहरबानी करके
घर के आसपास
प्राचीरे मत उठाइये
खोले रखिए घर की आंखें
और ज्यादातर खिड़की दरवाजे अपने
लेकिन यह करते हुए
आप सावधान भी रहिए कि कहीं
शान्त आक्रमण की तरह
प्रवेश तो नहीं कर रहीं चालाक दिशाएं
वरना आप
अपने ही घर में खुद को गुलाम पायेंगे
तब आपके पैर
आपकी सांस्कृतिक गिरफ्त से
धीरे -धीरे उखड़ते जायेंगे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता चेतावनी है हमारे वैचारिक बदलाव में आती सांस्कृतिक चेतना के लिए ।चेतना और विचार का परिवर्तन सहज ही महसूस नहीं होता ।उदारता कब संकीर्णता में बदल जाये ।प्रेम कब नफरत में बदल जाये ।अहिंसा कब हिंसा में बदल जाये यह आदमी को बहुत गहराई से महसूस नहीं होता ।यह वैचारिक बदलाव है जो आसपास के माहौल के बीच रहते रहते भावनाओं पर असर करता है । अब पड़ोस के आत्मीय रिश्ते नफरत और द्वेष के सबब बन जायें कह नहीं सकते ।घर एक भावनात्मक सुरक्षा का जरिया है । यहां बसे हर प्राणी में एक संवेदनशील नाता – रिश्ता और आत्मीय मनोभाव स्वत: जुड़ जाते हैं । यही तो है घर में आती हवा और आता उजाला जो मन को उदार और खुला पन देता है ।मकान से घर बन जाता है ।घर का मतलब ही होता है संकीर्ण मनोवृत्तियों का परित्याग ।सहज भरोसा ।सरल हृदय । सहृदयता और करुणा का आदान – प्रदान । ये “प्राचीरें” का मतलब क्या है ? ” प्राचीरें ” महलों , भवनों के आसपास होती हैं उनकी सुरक्षा और चौकीदारी के लिए जो भवनों को खास बना देती है । जहां हर कोई का आना – जाना सहज नहीं होता उनकी निगाह बानी के लिए उठाई जाती है चारदीवारी , लेकिन घर आम आदमी का होता है जो सहज विश्वास और भरोसे की दीवारों से रक्षित होता है । जहां रक्षक या प्रहरी नहीं होते ।प्राचीरें महलों का अहसास लिए होती है ।प्राचीरें दृश्य भी होती हैं और अदृश्य भी ।अदृश्य सीमाएं मनुष्य के भीतर से भरोसा ,नफरत, ईर्ष्या ,द्वेष, विकार ,कुण्ठा और ग्रंथियों के साथ उपजता है ।हर समय चाक – चौबंद ,सावधान , आक्रमण शील स्वभाव ही वह प्राचीर है जो दिखाई नहीं देती लेकिन महसूस जरुर होती है । –” खोले रखिए घर की आंखें ” यह एक संदेश है । एक संकेत भी है । यह क्यों है इशारा ? यह उस अनुदारता ,उस नफरत, उस घृणा , उस धोखे,उस कपट,उस छल के प्रति जो हमारी वैष्णव करुणा का हरण कर लेने वाला है । खोले रखिए घर की आंखें ? याने घर की उस सहज चेतना को जिस अवधारणा पर मकान से घर की बुनियाद रखी गई है ।उस उदारता को हमेशा बरकरार रखिए । जहां साईं से मुट्ठी भर मांगा जाता है लेकिन उस जरुरत में कुटुम्ब समाया हुआ है । जहां चींटी से लेकर हाथी की क्षुधा चिन्ता समाई है ।यह है वैष्णव करुणा । यह है घर का धर्म।यह है घर की आस्था । यह है मनुज धर्म । यही है वैचारिक संकीर्णता के प्रति जागरूक चेतावनी और सावधानी ।नये विचारों के आने के लिए आदमी को अपना मन ,मस्तिष्क, अध्ययन,स्वाध्याय ,चिन्तन, मनन के दरवाजे खिड़कियां हमेशा खोलें रखना चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति,अपनी चेतना,अपनी बुध्दि विवेक पर कहीं शान्त आक्रमण न हो रहा हो । कहीं हमारी बुनियादी विचार ही न बदले जा रहे हों ।हम करुणा से क्रूरता की ओर , संवेदना से बरबर्ता की ओर , ईमान से बेईमानी की ओर , सत्य पर भरोसा करते करते कहीं ईमान के लुटेरे तो नहीं बन गये ? कहीं न कहीं हम पर अनजाना ,अजनबी विचार के प्रभाव में आकर हम उस परापेक्षी विचार की गुलामी में जकड़ जायेंगे जो हमारी संस्कृति और सभ्यता के अन्तरंग का हिस्सा ही नहीं है ।यह वैचारिक गुलामी धीरे – धीरे हमारी संस्कृति की बुनियाद से हमें उखाड़ देगी ।इस अदृश्य और अनजाने वैचारिक आक्रमण के प्रति हमें हमेशा सजग और सचेत रहना चाहिए । यह हमला हमसे हमारी आस्था ,हमारी चेतना ,हमारी संवेदना,हमारा लोक ग्राही विश्वास , हमारी समन्वय वाली संस्कृति को नष्ट कर रहा है ।इससे हमारी लोक संस्कृति की निरंतरता, हमारी लोक संस्कृति की निर्मलता ,हमारी समूह चेतना को भी छीना जा रहा है ।हमारी संस्कृति की बुनियाद को उखाड़ा जा रहा है ।भारतीय संस्कृति का मूल विचार ही है कि यह भारत भूमि एक मानव महासागर है जिसमें सभी संस्कृति, सभी सभ्यताएं , और सभी जातियां आकर घुल – मिल जाती हैं ।यही अवधारणा तो हमारी सांस्कृतिक चेतना का प्राणाधार है । आज विश्व व्यवस्था हमारी इसी अवधारणा को नष्ट करने को आतुर है ।हमें इसीलिए अपने घर की आंखें खोले रखना है ।सरलता का अनुसरण करते करते कहीं हम अपने आपको सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरों में न जकड़ दें ।आधुनिक बनने के फेर में कहीं हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को उखाड़ तो नहीं रहे इस पर भी विचार करना चाहिए । सचमुच हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर हो रहे हैं ।इस पर पुनर्विचार होना चाहिए ।समाज को अपनी वैचारिक गुलामी और सांस्कृतिक बदलाव पर भी गहराई से विचार करना चाहिए । समाज को संताप में डालते भ्रूण हत्या के कृत्य हो या महिलाओं पर होते अत्याचार ये सब भी हमारी जड़ें उखड़ने के संकेत ही हैं
विनीता रघुवंशी
