12
पिता की डायरी
*************
( १ )
मां ने जतन से रखी है पिता की डायरी
चाहे जब एकान्त में फेरती उस पर हाथ
ठीक उसी तरह जैसे कि —
आखरी वक्त तक फेरती रही थी
पिता की देह पर
अकेले में चाहे जब आवे में रख लेती
और जब भी कोई होता तो
झट्ट से पुराने संदूकचे में रख लेती उसे
जो गौने की विदाई पर
नाना के घर से उनके लिए आया था
ऐसा क्या है पिता की डायरी में
कि मां उसे गिरन्थ – सा सहेजती
गरीब की पूंजी – सा संभालती
और उसके खातिर चार – आठ दिनों से ज्यादा
हम लोगों के पास भी नहीं रुकती कभी
पिता ने खुद अपने हाथों बुना था जीवन
खुद ठोकरें झेलते हुए दुकान दुकान बचाते रहे घर
उई की ध्वनि तक नहीं निकाली आंगन तक
खरोंच तक नहीं आने दी फाटक पर
किफायती से जोड़ते रहे गिरस्थी
और की बार ठगे जाकर भी उनने
नहीं लिखा ठगों का हिसाब डायरी में
इसके बाद भी जिस दिन कक्का ने
पिता पर कर्ज बकाया की बात कही
तो मां डायरी का पन्ना पन्ना
बांचती बंचावती रही उस दिन
जिसमें कहीं भी नहीं लिखी थी
कक्का की उधारी वाली सिलक
तब से मां लंबी सांसें छोड़ती
घण्टों चुपचाप बैठी रहती है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
साहित्य के सृजन में डायरी लिखने की कला बहुत ही बुनियादी पहल होती है ।यदि कोई लेखक बनना ही चाहे तो उसे सबसे पहले अपनी दिनचर्या का कुल जमा हाल डायरी में लिखना शुरु करना चाहिए। मुक्तिबोध के द्वारा लिखी गई डायरी बहुत उम्दा साहित्यिक विमर्श और मार्क्सवादी विचारधारा का खुलासा किया गया है ।साहित्य के भंडार में डायरी लेखन ने बहुत अच्छा सृजन उपलब्ध कराया ।पिता की डायरी भी घर – गृहस्थी के व्यय का विवरण है ।कभी कभी घर के ,गृहस्थी के व्यय को नियंत्रित करने के लिए भी डायरी याने रोज के खर्चों को लिखा जाता है ।यह मितव्ययिता का बहुत अच्छा साधन है ।इस तरह से अपने दैनिक खर्च पर स्वयं ही निगाह रखी जा सकती है ।डायरी लेखन से फिजूल खर्ची पर भी अंकुश लगाया जा सकता है ।आज वर्तमान ने समाज को फिजूल खर्च बनाया है ।उदार बाजार वाद के आकर्षण ,,प्रलोभन, और आवश्यकता न होने पर भी खरीदने का लालच यह समाज के दिखावे का साधन बन गया है ।जिस तेजी से आमदानी की बढ़ोतरी नहीं होती उससे ज्यादा आज का आदमी आधुनिक दिखने के फेर में व्यय क्षमता का प्रदर्शन करता है ।यह व्यय शील जीवन शैली पर नियंत्रण करती है डायरी । इसमें जीवन के लोक व्यवहार भी दर्ज होते हैं और कर्ज ,मर्ज का हिसाब – किताब भी लिखा जाता है ।जीवन की ठोकरें याने सबक भी दर्ज होते हैं ,और जीवन को, गृहस्थी को सम्भालने की कला भी सीखी जाती है ।गृहस्थी का दायित्व उठाने में बहुत से दचके लगते हैं ,बहुत से धोखे मिलते हैं , बहुत बार ठगी को समझते हुए भी मौन साधना पड़ता है । जीवन को साधना मामूली काम नहीं ।मां के लिए पिता की डायरी एक उसूल है जीवन जीने का ,एक जीवन शैली है , पिता की डायरी एक जीवन रेखा है जिन्दगी को अपनी पटरी पर चलाये रखने की मां के जीवन का कुल जमा खर्च है डायरी में पिता की डायरी अन्तिम दस्तावेज है पिता के हाथों लिखा गया ।वह प्रमाण भी है लेन – देन का ।परिवार की नींव है डायरी । इसीलिए मां चुपचाप आत्मसात करती है पिता की लिखी हुई इबारतें डायरी में ।पिता का अहसास है पिता की डायरी में । देह छोड़ी जा सकती है लेकिन डायरी का लेखा – जोखा नहीं छोड़ा जा सकता ।पिता की डायरी गृहस्थी की बसाहट का दर्ज इतिहास है ।उस दुख का विवरण है जो कहीं नहीं दर्ज है । मन के कष्ट हैं ।संताप और कष्ट की अनुभूति है डायरी में वे समझौते हैं जो लिखे नहीं गये लेकिन जो अब भी कभी कभी महसूस होते हैं ।अहसास है उन बुरे दिनों का जो अब नहीं है लेकिन कहीं न कहीं डायरी में अनलिखे रह गये हैं ।मन में उनकी स्मृतियां उभर -उभर कर डायरी के पन्नों पर अमिट निशानी बन जाती है । मां तब भी चुप थी जब पिता घर- गृहस्थी के लिए संघर्षरत थे मां आज भी चूपचाप है पिता की डायरी को सहलाते और सम्हालते हुए ।मां का यह निर्निमेष भाव हर समय पिता की डायरी में कहीं न कहीं लिखा जाता रहेगा ।मां के लिए हर समय पिता की डायरी पिता की उपस्थिति महसूस कराती रहेगी । स्वतंत्रता के दौर में बहुत से परिवारों ने डायरी लिखने का चलन बढ़ा था और आज भी डायरी लिखने की यह रीति चली आ रही है ।यह भले ही दैनिक जमा – खर्च का मामूली हिसाब – किताब ही है किन्तु इससे आदमी अपने आर्थिक असंतुलन पर नियंत्रण कर सकता है ।डायरी लिखना रोजमर्रा की गतिविधियों पर नजर रखने का कारगर साधन है ।
विनीता रघुवंशी
