Home आज की कवितापिता की डायरी-पकी फसल के बीच

पिता की डायरी-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पिता की डायरी
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( २ )
मां ने किसी को भी नहीं कोसा आज तक
इसलिए कि पिता की डायरी में
कहीं भी नहीं टोका है
किसी को भी कोसने का हिसाब
वहां तो पाई पाई नामा जमा है
भूल चूक लेनी – देनी तक का
मेरी ही जांच पर
सिर रखे उस दिन
मानों एक एक सांस का हिसाब – किताब
चुकता करते हुए
चल बसे थे पिता
जब की तब
बेदाग पड़ी थी उनकी देह
छोड़ी हुई डायरी की तरह
सांस का आखरी तार टूटने तक
समझाते रहे थे पिता
यह कहते हुए कि —
सिर्फ हिसाब के लिए ही
रखी थी डायरी उनने अपने पास
फिर कहा था मुझसे यह कि
सौंप कर जा रहा हूं तुम्हें
ज्ञान गूदड़ी रचता ये आसमान
माटी के लिये उजालती धरती
लगातार घूमती ये सूईयां
और पल – पल संघर्ष करता ये समाज
यही सब तुम्हें
परिवार के साथ सौंप कर जा रहा हूं बेटे
तुम इसे पृष्ठ पृष्ठ
पढ़ते गुनते रहना मेरे बच्चे !
तबसे मुझे नींद में जब तब
इसी तरह बतियाते
दिखाई देते हैं पिता
और तभी से
रख छोड़ी है मां ने अपने पास
जतन से पिता की डायरी !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
कोसना याने दोष देना , आरोप लगाना ,तोहमत लगाना , या गालियां देना , या अपनी नाकामी के लिए किसी को दोषी ठहराना ।यह सब मतलब होता है कोसने का । पिता की डायरी में असफलता की जिम्मेदारी किसी पर नहीं डाली गई है । डायरी में सब के नाम पर जमा है ।कुछ भी उधार नहीं । भूल चूक लेनी – देनी तक का हिसाब बिलकुल साफ़ हैं । किसी से कुछ भी नहीं वसूलना । न किसी का उधार पटाने का दायित्व। यह बेदाग जिन्दगी का दैनिक नामा है डायरी । डायरी में जो नहीं लिखा गया वह है पिता की संवेदनशील मन की चिन्ता ,समझ ,आत्मबोध ,आत्मज्ञान से भरी निर्विकार जीवन शैली । इस तरह का मनोविकार शून्य जीवन ही तो है जो सब को त्याग कर जाते हुए भी सौंप जाते हैं ज्ञान गूदड़ी रचता आसमान ,माटी के दिये चलाती धरती , लगातार घूमती सूइयां याने समय और पर – पर संघर्ष करता समाज ।कितना कुछ सौंप दिया है पिता ने अपनी अन्तिम सांसों के साथ पुत्र के लिए । यह एक पिता ही सौंप सकता है पुत्र के लिए विरासत में ।पिता अन्तिम समय भी अपनी जिम्मेदारी से बचते नहीं वरन पुत्र को दिशा देते, निर्देश देते समझाते हैं दुनिया में सोचने समझने का बोध । काल की सुइयों का घूमना , आसमान से निसृत ज्ञान की चेतना , धरती पर पसरता माटी का उजाला , सबसे बड़ी जो ज्ञान चेतना का बोध है पिता की बातों में वह है अपने समाज के संघर्ष को जानने की बात जो बहुत गंभीर है ।समय अनुभव देता है , धरती पर माटी सब तरह के उजाले का पर्याय है ।सब समस्या का समाधान है माटी ? सबसे बड़ा ज्ञान है समय के चक्र को समझना । काल का ज्ञान बोध का होना ।यही तो है पिता की विरासत और वसीयत जो एक चेतनावान पिता पुत्र को मृत्यु पल में सौंप कर जाना चाहता है । यही तो है सबसे बड़ी धरोहर । पिता की डायरी में लिखा है । समय का ,हर पल का हिसाब । डायरी में नहीं लिखे गये जिन्दगी की राह में आये अवरोधों के बारे में क्योंकि पिता अपनी चूकों का ,अपनी गलतियों का, अपनी हार का ,अपनी असफलता या नाकामियों के लिए किसी को दोषी नहीं देना चाहते थे इसीलिए तो उन्होंने कोसने के कोई हवाले डायरी में दर्ज नहीं किये । इसीलिए उन्होंने डायरी के पृष्ठ – पृष्ठ को पढ़ते ,गुनने की समझ सौंप दी बेटे को ।पिता की डायरी इसीलिए मां के लिए अनमोल विरासत है तो बेटे के लिए पिता से नींद में मिलने का सहारा है ।पिता जब तब बेटे की स्मृतियों में आकर बतियाते हैं और मां जतन से पिता की डायरी को घर – गृहस्थी का विधान समझ सम्हाले है डायरी को । बेटा आसमान के ज्ञान और धरती की माटी का उजाला समेटे अपने समय की सूइयों के साथ समाज में शामिल संघर्ष के पल – पल को जीता जिन्दगी के मायने तलाशता है पिता की डायरी में ।आजादी के संघर्ष के समय में हर घर में गीता प्रेस गोरखपुर से छपी दैनिक दैनंदिन ही होती थी ।एक सुघड़ गृहस्थ इस डायरी को नियमित रूप से दैनिक चर्या को लिखता था ।बाद में भी यह सिलसिला बहुत से घरों में जारी रहा ।यह जो कविता की भाषा है वह महाजनी होते हुए भी यह बोध जगाती हैं कि हर गृहस्थ को अपनी मितव्ययिता से अपने आर्थिक प्रबन्धन को सम्भालना चाहिए । अपनी खुद की नजर जब अपने आप पर होगी तो फिजूल खर्ची खुद ही रुक जायेगी ।हर घर में घर का मुखिया मौजूद हैं ही तो हर घर में पिता की डायरी आज भी हमारी स्मृतियों को बरकरार रख सकती है । डायरी धरोहर है । समाज की चेतना की पारखी है डायरी । 🙏 विनीता रघुवंशी

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