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विनीता रघुवंशी
सतपुड़ा की शाम
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बड़ी – बड़ी घाटियों पर
अचार चुनती हुई बुढ़िया – सी
किरन ओझल हो गई
और अब रह गया
महुओं सा भरा आकाश
बीच – बीच में
कहीं – कहीं तेंदुओं के झुण्ड जैसे
छितराये बादल
वनराज की पहली दहाड़ से
गूंजता हुआ डोंगर और
दावाग्नि पैदा करने वाली –तेज हवा
कोंगो ,कुटकी ,बाजरा फटकती हुई मोड़िया
मेरी की हड्डियां खदकाती वन देवियां
कंधों पर कुल्हाड़ी लादे वन वासी और
समा – धान की फसलों पर मंडराते हुए तिलियर -झुण्ड
मचान पर खड़ी होकर गुफना चलाती
पूस माघ की हवा शीतल
पहाड़ की पसलियों से रेंगता नदी का जल
रात भर
अलावों के सहारे लेटे
बतियाते लोग
जिन्हें न जीवन से
कोई बनावटी लगाव
और न कोई असहज भोग
करते – जागते हुए आराम
सर्वत्र काम !
सतपुड़ा की शाम !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता की शुरुआत ही उत्प्रेक्षा अलंकार से होती है ।सतपुड़ा की शाम ऐसी प्रतीत हो रही है मानो वह एक सतपुड़ा अंचल में रहने वाली बुजुर्ग पहाड़िन है जो जंगल में अचार चुनने आई है । यह बुजुर्ग बुढ़िया और कोई नहीं सूरज की किरन है जो सांझ के ढलते ही नज़रों से ओझल हो गई ।अब बस रह गया महुओ – सा भरा आकाश । सफेद – सफेद रुई के गोलों से उड़ते बादल जो महुआ की प्रतीति करा रहे हैं । जंगल है तो वहां तेंदुए भी स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं यह सब दृश्य आकाश में उभर रहे हैं ।इसी तरह सांझ होते ही वनराज दहाड़ उठे हैं और जंगल की आग को पैदा करने वाली तेज हवा सांय – सांय चल रही है । सांझ के समय भोजन की तैयारी में व्यस्त ग्रामीण स्त्रियां, महिलाएं और नव युवती लड़कियां अनाज साफ कर रही हैं ।यह अनाज जंगल की खेती की ही पौष्टिक उपज है । यहां जंगल में जो आसानी से उगाया जाता है वह है कोदो ,कुटकी (यह चावल की ही एक प्रजाति है ) बाजरा फटकती लड़कियां जो झोपड़ी ,घरों के द्वार -द्वार पर फटकती देखी जा सकती है ।वन देवियां महेरी की हंडिया चूल्हे पर चढ़ाये खदका रही हैं ।यह समय जंगल से वनोपज बीनकर लौटने का समय है और सब जंगल से गांव में लौट रहे हैं ।वनवासी कंधों पर कुल्हाड़ी लिए लौट रहे हैं ।कुल्हाड़ी को यहां के लोग दो तरह से इस्तेमाल करते हैं एक आत्म रक्षा के लिए और दूसरे वनोपज ,पेड़ ,ईंधन के लिए लकड़ी काटने आदि के लिए हमेशा साथ रखते हैं वन है तो वन पशु भी यहां स्वछंद विचरण करते रहते हैं। जंगल की फसलों पर स्वार्थ और लालची नजरें गड़ाये वह शासन का अमला भी झुण्ड की तरह यहां – वहां मंडराता रहता है ।यह जंगल की फसलों पर तिलियर झुण्ड ही हैं जो फसलों को अपनी लालची ,भ्रष्ट , स्वार्थी उड़ानों से नुकसान पहुंचाने के लिए जंगलों में भटकते रहते हैं । यह रचनाकार की निगाह से नहीं बच सका ।पूस माघ की हड्डियां कंपा देने वाली ठण्डी हवा ऐसी लग रही है मानो फसलों को नुक्सान पहुंचाने वाले पक्षियों को उड़ानें के लिए गुफना चलाती नव युवती फुर्ती से पंछियों को उड़ा रही है । इससे भी खूबसूरत बिम्ब का प्रयोग कविता में दृष्टिमान हो रहा है पहाड़ की पसलियों में बहती नदी की जलधारा का चित्रण ।पहाड़ की पसलियों का जिक्र कविता के सौन्दर्य को दुगना कर दे रहा है ।रात भर अलावों के सहारे बतियाते लोग ये फसल की रक्षा ,जंगल की सुरक्षा और जंगली हिंसक पशुओं से बचाव का तरीका जहां एक जुटता है और संवाद की निरंकारी प्रस्तुति ।आपस में जब बातचीत और संवाद जारी रहेंगे तब सब तरह के कष्ट और संकट दूर हो जायेंगे ।सतपुड़ा अंचल में रहने वाले सभी जन सादगी से जीवन व्यतीत करते हैं और बस अपने – अपने काम में डूबे रहते हैं । इस तरह गुजर जाती है सतपुड़ा की शाम ।रोज आती है और अपने प्राकृतिक सौन्दर्य को बिखेर कर चली जाती है । काम में डूबी सतपुड़ा अंचल की आबादी परिश्रम शील ,कर्मशील और निष्काम चेतना में निरंतर रत है । यहां भोग नहीं वरन भाव भक्ति की सादगी भरा जीवन प्रवाह है ।नर्मदे हर के गूंजते जयकारे हैं ।
