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बच्चे – आकार लेती यात्राएं

by admin
बच्चे
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बच्चे
पेड़ नहीं काटते
पत्तियों से निकाल कर रस
बनाते हैं
दीवारों पर कल के नक्शे
बच्चे
चिड़िया नहीं मारते
उनके पंखों को
बीन बीनकर
सजाते हैं मेज
बच्चे
दीवारों को
लहलहाते पेड़ और
मेजों को
चहचहाती चिड़िया बनाना चाहते हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
बच्चों के मन में एक सकारात्मक दुनिया रची बसी रहती है ।वे नकारात्मकता को नहीं जानते समझते ।वे जो भी कल्पना करते हैं वह उनकी बाल क्रीड़ा और मनोविनोद , मन बहलाव का कौतुक होता है जो क्षणिक होता है ‌।हर बार वे अपने मन बहलाव के लिए नये नये खेल रचते हैं और जल्दी ही उनसे ऊब भी जाते हैं । हर बार नया खेल यही उनके बाल मन की संरचना होती है ।बचपन चंचल होता है । उनका रचा खेल लेकिन किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाता है ।वे खेल खेल में पेड़ों की पत्तियों से रस निकाल कर दीवारों को रंगना ,चित्र बनाना सीखते हैं । उनमें उनके देखे – परखे संसार की ही अनुकृति होती है ।वे दीवारों पर नाचते मोर पंख – पखेरु, पशु , पेड़ की आकृतियां उकेरी कर खुश होते हैं ।यह दुनिया को देखने का उनका नजरिया होता है ।वे किसी भी चीज को नष्ट नहीं करना चाहते उन्हें दुनिया से जो सामान और वस्तुएं मिली हैं वे उन्हें ही बेहतर और बेहतर और सुन्दर दिखाना चाहते हैं ।जब उनसे कुछ छीना जाता है तब वे अपने बोध में नकारात्मक विचार से आहत होते हैं ।उनका परिचय नकारात्मक प्रभाव से पहचान बनाता है ।यह असर कभी क्षणिक और कभी कभी बहुत गहरा हो जाता है । बच्चे निडर और निर्भय होते हैं ।उनके पास असीमित उत्साह ,उमंग और अन्त हीन हौंसले होते हैं ।वे संसार को रचनात्मक देखते हैं ।उनके भीतर नाश और स्वार्थ की अनुगूंज नहीं होती वे ।अपने आसपास की दुनिया को रोचक कल्पनाओं से भर देना चाहते हैं ।क्योंकि खुदगर्जी उनकी चेताना को बिल्कुल भी मैला और विकार ग्रस्त नहीं करती ।विकृति ,भरी लालसा उनकी संवेदना को , बोध को , सत्य को , मटमैला नहीं करती ।वे जैसे नैसर्गिक स्वभाव से जन्मते हैं वैसा ही उनका निष्कलुष मानस रहता है । इसीलिए वे दुनिया को सुरक्षित और रचनात्मक देखना चाहते हैं ।वे आशा भरे सपनों को साकार करके संसार को समर्पित खुशहाली देना चाहते हैं । बच्चों का यह आसक्ति भाव ही उन्हें उमंगों से , अनथक उत्साह से सराबोर रखता है ।कविता बाल मनोविज्ञान की खूबियों से रची बसी है ।नव पीढ़ियों के पास संरक्षण भरा भविष्य है जिसे वे सृजन से परिपूर्ण करना चाहते हैं ।यह कविता का इशारा भी है । बच्चों की रोमांचक दुनिया को उजाड़ने का काम हर बार सत्ता के निहित स्वार्थ करते हैं । इस तरह उन्हें जो दुनिया मिलती है वह बारुद , माफिया , और चेतना हीन स्वार्थ से भरी दुनिया मिलती है जिसमें उनकी कोई रचनात्मक हिस्सेदारी नहीं होती लेकिन वे दुनिया को हर बार साफ – सुथरी ,मनोहारी ,और सुन्दर बनाने की कोशिश करते रहते हैं । यह कोशिश आपसी प्रतिस्पर्धा और हथियारों की दौड़ – दौड़ के कारण तहस – नहस हो जाती है । दुनिया सुन्दर बनी रहे यह बहुत ही कोमल विचार है ।यह बच्चों का ही नहीं हर विश्व वासी के मानस का सपना होना चाहिए तब ही अहिंसा का विचार बल पा सकेगा ।जब तक हिंसा है तब तक विश्व बदसूरत रहेगा ।एक खूब सूरत विश्व बच्चों की कल्पना का हिस्सा ही है ।वे बाल क्रीड़ा से भरे उसे खेलों से अपनी मेज और दीवारों पर रचते रहेंगे । कविता का विषय बहुत गंभीर है जो हमें बचपन के रोमांच भरे यथार्थ से रु – ब- रु कराते हैं ।
🙏 विनीत रघुवंशी

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