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विनीता रघुवंशी
आदेश सो रहे हैं
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शोर मत करो —यहां
आदेश सो रहे हैं
जाग गये तो गज़ब ढा देंगे
गर्दनें झुकायें चलो
ताकि सड़क को भी लगे कि उस पर
एक शान्त रैला फैल रहा है
जो भी रास्ते में देखा या सुना
घर आकर मत दुहराओ
दुहराने से बात
अंधों के हाथ लगा हाथी हो जाती है
जिसे घर में पालना ठीक नहीं
पालना ही चाहते हो तो —
तोता पाल सकते हो
जो हमें
बंद पिंजरे में घूमते रहने की
सही प्रेरणा देता रहे
शोर मत करो
यहां आदेश सो रहे हैं
जाग गये तो कहर ढा देंगे !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आजादी के बाद देश के संकटों में एक संकट आया आपात काल का जब संवैधानिक संकट को आपातकाल का जामा पहनाया गया और देश की अवाम को इमरजेंसी याने आपात काल को सहना पड़ा ।वर्तमान काल भी अघोषित आपात काल के संकटों से जुझ रहा है ।आपात काल का मतलब है अवाम की लिखने – बोलने और कहने की शक्तियों पर पाबंदी , समाचार पत्रों पर सही समाचार छापने ,प्रसारण की पाबंदी । सत्ता के संकेतों और आदेशों पर सख्ती भरे कड़े रुख ,जेल , मीसा नियम और भी न जाने क्या – क्या पाबंदियां और कठोरता । यह सब हुआ है घोषित आपात काल में और आज भी अघोषित आपात काल में भी वही सब जारी है ।आदेश से शासन – प्रशासन चलाया जाता है ।आदेश सख्त हैं और इन आदेशों ने न केवल जनता की आजादी छीनी है बल्कि इन आदेशों ने अधिकारियों की फितरत ,चरित्र ,और प्रलोभन ,भय ,लालच वाली बना दी है ।यहां तक की न्याय व्यवस्था,शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था भी इससे प्रभावित हुई और यहां भी भ्रष्ट सत्ता का बोलबाला दिखाई देने लगा । जनतंत्र का चरित्र बदला और धनतंत्र ने दलाल सत्ता समीकरणों के सूत्र वास्तविक राजनैतिक सत्ता से छीन कर दलाल सत्ता के बहुआयामी रुप स्थापित किये ।यह अघोषित आपातकाल का वह विद्रूप चेहरा है जिससे जनता खौफ खाने लगी । इसलिए कविता में स्पष्ट इशारा है कि अभी आदेश प्रसारित करने वाला तंत्र सो रहा है यदि वह जाग गया तो अत्याचार करेगा ,अन्याय करेगा और न्याय पाने के रास्ते बन्द हो जायेंगें ।उन पर पहरे बैठा दिए जायेंगे ।जनता की सभी हलचल और गतिविधियों पर शासन की पैनी नजर टिकी है । सत्ता हर समय जनता का मौन समर्पण चाहती है ।वह जनता के मन में उठते सवालों , जनता की आकांक्षाओं और उम्मीदों को अनदेखा ,अनसुना ही रखना चाहती है ।वह हर बार अपने दबाव का इस्तेमाल करती है, उसके पास राष्ट्र द्रोह के बने बनाए सबूत होते हैं ,कानून की धाराएं होती हैं ,जेल है , आर्थिक अपराध और टैक्स चोरी के इल्ज़ाम हैं , उसके पास बहुत से प्रशासकीय अधिकारियों का अमला है जो जनता पर ज़ुल्म और अत्याचार करने के लिए तैनात हैं ।ऐसी अदालतें और न्यायमूर्ति हैं जो प्रलोभन में अपने जमीर और न्याय की आशा को खोखला बना चुके हैं ।यह सब भी सत्ता के समक्ष मूक दर्शक बन कर अपनी चेतना को अर्पित कर देने का ही उपक्रम होता है । यदि जनता कुछ भी खिलाफ या विरोध में आवाज उठायेगी तो सरकार का एक ही आदेश उसे चुप करा देगा । इसलिए जिस सत्ता और सरकार के पास मूक ,बधिर , और विक्षिप्त अवस्था के आदेश हों जो न्याय संगत न हो उनके सामने जनता की समझदार चुप्पी ही कारगर पहल है ।यह आपात काल के भय के माहौल को व्यक्त करती कविता है ।यदि घर के भीतर भी सत्ता के खिलाफ कोई अभिव्यक्ति या विचार व्यक्त किया तो सरकारी आदेश सब कुछ तबाह कर सकते हैं ।यह भय का दबाव है , आदेशों का भय है , सख्ती है ,आदेशों से तबाही और कहर मचाया जा रहा है ।यह सब हो रहा है आपातकाल में यह सब हो रहा है अघोषित आपातकाल में ।क्या आपात अवस्था इतनी खतरों भरी होती हैं जहां नागरिक अधिकार स्थगित हो जाते हैं ।यह विचारणीय तथ्य है ।कैसी भी आपात दशा हो उसमें नागरिक अधिकार स्थगित नहीं होने चाहिए ।हर देश की चेतना नागरिक ही तो हैं ।यदि सत्ता अपने निहित स्वार्थों को दृष्टिपथ में रख कर नागरिकों के प्रति संवेदना शून्य होगी तो फिर संप्रभुता , संविधान ,संसद , कार्यपालिका के सभी राष्ट्रीय हित भी प्रभावित होंगे ।आपातकाल भी संवैधानिक व्यवस्था का ही हिस्सा है लेकिन सरकार और सत्ता हमेशा जनता को चुप और भयभीत करने के लिए इसका बेजा इस्तेमाल करती हैं ।सत्ता के द्वारा किया गया दुरपयोग ही आपातकाल को क्रूर और अमानवीय कृत्य ही इसके रुप को भयानक संकट बना देता है । जबकि आपातकाल की यह संवैधानिक व्यवस्था नागरिकों के अप्रतिम सहयोग के लिए ही रखी गई है ।सत्ता और सरकार इसे अपने स्वार्थ और लाभ के लिए प्रयोग करती है इसलिए यह नागरिकों को आहत करने वाली ,चुभने वाली ,कड़वेपन से भरी लगती है ।आपातकाल का सही अर्थ में प्रयोग जन चेतना के लिए किया जाना चाहिए तब ही इस संवैधानिक व्यवस्था का फायदा सरकारों और सत्ता को सकारात्मक परिणाम के साथ मिल सकेगा ।आपात काल सत्ता के स्वार्थों के विद्रूप को ही उभारता है । कविता के संकेत बहुत कुछ व्यक्त करते हैं । इमरजेंसी भारतीय इतिहास का एक काला पृष्ठ ही है वह चाहे घोषित हो या अघोषित दोनों स्थितियां दारुण दुख देने वाली ही है ।
