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चलो अब
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तुम्हारी गोदी में
सिर धरे सोता हूं
उस वक्त मैं
एक नन्हा मेमना होता हूं
उस वक्त—
मेरा यह अपनापन और
उसके आसपास का सब कुछ खो जाता है
जब मेरा यह “मैं”
तुम्हारी गोद में सिर धरे सो जाता है !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कबीर दास जी की ये पंक्तियां मुझे सहसा स्मरण हो रही है — ये तो घर है ,प्रेम का ,खाला का घर नाही । सिर उतारे भुईं धरे ,तब बैठे मन माहीं ।।
निज अहम की विस्मृति ही वह प्रेम की अनुभूति है जहां स्वयं की चेतना का लोप हो जाता है । जहां ” मैं ” का विसर्जन हो जाता है । कबीर दास का सिर उतारे भी यही है ।याने मगज पर ,दिमाग पर जो “मैं ” का ममकार चढ़ा है उसे उतार देने पर ही सच्चे प्रेम की अनुभूति ,अहसास महसूस होता है ।प्रेम में सर्वस्व समर्पण कर देना ही परस्पर प्रेम की प्राप्ति होती है । यहां प्रिया की गोद में ममत्व का अनुभव कविता की व्यापकता है ।प्रिया में ममता की अनुभूति और अपने अहंकार के वजूद का ,बोध का मिट जाना ही वह अवस्था है जहां ” मैं ” सिमट जाता है और मन के भीतर दबी मासूमियत , कोमलता का सहसा उभर आना बड़ी मार्मिक भाव दशा है । यहां प्रिया का प्यार यथार्थ को भूल कर केवल ममत्व में विस्तीर्ण हो रहा है ।यह भावानुभूति आसपास को याने वातावरण को भी विस्मृत कर देती है । सब कुछ को खोकर जो अनमोल भाव – प्राप्ति होती है वह अहंकार का विसर्जन ही है ।प्राणीमात्र वास्तविक प्रेम का प्रदर्शन भी अपने वर्तमान को भूल कर ही कर सकता है । यह प्रेम बहुत ही अनमोल और चेतना को जागृत करके भी खो देने पर ही मिलता है ।यह खोना अपने आपका खोना ही है ।जब तक प्रेम में अपने आपका वजूद मौजूद रहेगा तब तक प्रेम का अनुभव भी चेतना , संवेदना ,और करुणा में गंभीर होकर प्रकट नहीं होगा । प्रेम का सत्य तभी उभर कर सामने आता है जब दुनिया के सभी विकार ,सभी अपेक्षाएं ,सभी कामनाएं ,भोग में लिप्त मन निर्विकार हो कर डूबता है । वहीं स्थिति प्रेम का सच्चा अनुभव माना जा सकता है ।वहीं कबीर दास का –“सिर उतारे भुईं धरे है ” ।कविता में भी —“आसपास का सब कुछ खो जाता है ” जैसी दशा ही है ।बच्चा बन जाना मेमना बन जाना भी अपनी व्यस्कता का विस्मरण और चेतना में बसी समस्त चिन्ताओं का छूट जाना भी कोमलता अनुभव है । यहां सिर्फ और सिर्फ प्रेम की अनुभूति ही परम अनुभूति है । सांसारिक जगत से मुक्ति की अनुभूति और अनुभव है ।अहम का विसर्जन सहज अवस्था नहीं है । मनुष्य अपने पूरे जीवन काल में केवल अहंकार से ही बंधा रहता है । यह कबीर के शब्दों में समझें तो — “तब बैठे मन माहीं ” मन में अपना स्थान बनाना ,मन के भीतर ,मन के बीच उतर जाना ही तो चेतना में सदा बस जाना है , ख्यालों में समा जाना है , फिक्रों में शामिल हो जाना है , आत्म समर्पण ,आत्मा की आस्था में लीन हो जाना है , आत्म विभोर की भाव दशा का उदय भी तो यही है ।गोद में सिर धरे सोना याने पर सत्ता की आत्म स्वीकृति की अवस्था जहां एकोअहम द्वितीयोनास्ती ।यह सायुज्ज लाभ की दशा जो केवल निष्काम प्रेम में ही समाहित है ।जो प्रेम के भीतर है बाहर नहीं । प्रेम एक अनुभव है लोक व्यवहार नहीं । यह अनुभूति की भाव दशा से ही उपजता है । अपने को भूल कर ही यह पाया जा सकता है । जहां आत्म चेतना खो जाती है वहां प्रेम अपना अस्तित्व खोज लेता है । प्रेम को पाने के लिए पहली अवस्था है ” मैं “का त्याग । “मैं ” की दशा से बाहर आना ही प्रेम की दशा में समाहित हो जाने की शुरुआत है ।
विनीता रघुवंशी
