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चलो अब
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( २ )
माथे पर
चन्दन की टिपकी रखे
ये बूढ़ा आसमान
बड़ी शराफत से
चन्द्र किरणों के फोकस से
हमें देख रहा है
चलो, अब हम छत से उठें
ये खूसट —-
अपनी कोटवारी से बाज नहीं आयेगा !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
प्रेम प्रदर्शन की भाव दशा नहीं है ।यह एकान्त में बैठकर अनुभूति का भाव तत्व है ।प्रेम की मर्यादा ही इसके गोपन में बनाए रखने की स्थिति में ही यह ज्यादा प्रकट होता है ।समाज में यदि कुछ त्याज्य या निगाह बानी में रखने की स्थिति है तो वह प्रेम का अहसास ही है ।
समाज के बुजुर्ग ,और प्रौढ़ पीढ़ी नौजवानों के हर कदम पर , हर रिश्ते और संबंध पर अपनी पैनी नजर गढ़ाये रहती है ।यह समाज चेतना का विहंगम पहलू हो सकता है । यहां मर्यादा और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाश का भय भी हो सकता है ।समाज में सब कुछ यथावत और बिना बिखरे ,टूटे , बंधनों का तोड़ना , या परिवार जैसी सामाजिक व्यवस्था का सदा बने रहने की चिन्ता के कारण इस तरह की निगाह बानी की जाती है ।प्रेम एक सामाजिक विचार है लेकिन इसकी आड़ में जिस तरह की भोग लिप्सा का असामाजिक व्यवहार पनपता है ।वह सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक होता है ।किन्तु कविता में समाज के इस चिन्तक वर्ग पर जो प्रहार किया गया है वह बहुत ही अनूठा और पैना है ।छत पर फुर्सत के पलों को गुजारने की कामना है लेकिन बूढ़ा चांद अपनी किरणों से प्रकाश की किरणें छत पर डाल रहा है यही तो प्रेम के अहसास में असुविधाजनक है ।यह दुराव या छुपाव की अवस्था नहीं है लेकिन प्रेम की प्रस्तुति में किसी अन्य का हस्तक्षेप और दखल भी चुभने वाला है । इस लिए भरपूर एकांत की जरुरत है ।यह एकांत ही तो प्रेम के लगाव के बढ़ने की भाव दशा है । जहां समाज ताक – झांक करने लगे वहां प्रेम का दूषित हो जाना तय होता है ।प्रेम एक आत्मिक अनुभूति है । बूढ़ा चांद चन्दन की टिपकी यह एक चित्र है जो भक्ति भाव में डूबे पण्डित – पुजारी की छवि हमारे सामने उतारता है ।यह कविता में रचा गया बिम्ब ही है आसमान बूढ़ा है न जाने कितने युगों से आसमान पर चिपका है चांद उस पर चांद की सफेद चंदन सी गोल किरणे छत पर कई एंगल से पड़ रही हैं ।कविता में ” फोकस ” जैसा शब्द भी प्रयुक्त हुआ वह कविता के भाव सौन्दर्य को बढ़ा देता है । “कोटवारी” शब्द भी कचहरी में इस्तेमाल होता है । यह ग्रामीण अंचलों से थाने आदि पर सूचना पहुंचाने के लिए तैनात पद होता है ।जो शहर ,गांव, टप्पे,तहसील आदि की जानकारी मुख्यालय तक पहुंचाने का जरिया होता है । लेकिन कविता में प्रेम की कोटवारी से इसे जोड़ दिया गया है ।याने प्रेम भी अब व्यक्तिगत नहीं वरन सरकारी निगाह का हिस्सा हो चुका है ।प्रेम के व्यक्तिगत अहसास पर जब बुजुर्ग लोग नजरें गढ़ाए रहते हैं तो गुस्से और क्रोध में उन्हें जिस तरह गरियाया जाता है यह वही आक्रोश में व्यक्त ” खूसट ” शब्द है । कविता में व्यक्त प्रेम निजता की दरकार रखता है इसलिए वह गोपनीय है ।जब जब भी प्रेम को निजता की सीमाओं से बाहर , मर्यादा हीन व्यक्त किया जाता है तब तब वह अपनी गरिमा खो देता है ।प्रेम की गरिमा और सम्मान चेतना की सीमाओं में ही सुन्दर बना रहता है।प्रेम खुद के लिए है ,बाजार या सार्वजनिक नहीं । इसलिए प्रेम निजता के दायरे की मांग करता है ।दायरे में सिमटा प्रेम ही गंभीर , गरिमा मय और रति योग्य होता है ।प्रेम मनुष्य मात्र को निर्भय करता है । उसकी वैचारिक अवस्था उसे परिपक्व बनाती है । कच्चा प्रेम संशय, संदेह,दुविधा पैदा करता है । वैचारिक दृष्टि सम्पन्न प्रेम जग जीतता है । श्री कृष्ण और राधा का प्रेम दृष्टि सम्पन्न प्रेम है । प्रेम आत्मसम्मान और गरिमा का पर्याय है ।जो इसे नाक का सवाल या आनर किलिंग ,या इज्जत – बेइज्जती से जोड़कर देखते हैं वह लौकिक या सांसारिक प्रेम की गिनती में आता है ।ऐसा प्रेम त्याज्य होता है । प्रेम से परिवार जुड़ते भी हैं और प्रेम से परिवार टूट भी जाते हैं । प्रेम परिवारों में विरोध और विद्वेष का कारण भी बन जाता है । प्रेम के कारण युगों युगों तक संबंध बिगड़ जाते हैं और कुल – खानदान में स्थाई रंजिश ,बैर – विरोध के बीज बो देते हैं ।यह सब एकाधिकार की भावना के कारण होता है । इसलिए प्रेम की अनुभूति ,प्रेम का अहसास ,प्रेम की चेतना सब व्यक्तिगत होती है । उसमें हस्तक्षेप नहीं होता ।दखल नहीं होता ।उसके लिए अनुमति की भी जरुरत नही होती ।प्रेम में प्रिय और प्रिया का सहमत होना ही जरुरी होता है ।यही प्रेम की अनुभूति और वास्तविक स्थिति है।
विनीता रघुवंशी
