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चलो अब
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( ३ )
हम जिस जगह पर आकर
खड़े हो गये हैं
वह —
हमारी निगाहों तक ठोस है
आसमान की बातें
सिर माथे रखना फिजूल है
उस पर तो सपने रहते हैं या परियां
हमें तो चलने की हद तक चलना है
निगाहों की दूरी तक ठोस है ज़मीन अपनी ।।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
प्रेम एक विचार है ।यह भाव तत्व होते हुए भी कर्म की निस्वार्थ अनुभूति है ।यह फिक्र है ,यह चिन्ता है , यह भय है ,यह सुरक्षा है , यह निर्भय है तो इसमें ढेरों आशाएं समाई है ।यह मन की बेचैनी है ,धीरज है और आकुलता है , समर्पण है तो आस और निरास के भाव भी हैं ।यह सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है । यही तो प्रेम की सच्ची अनुभूति है ।यह एक वैचारिक चेतना है जो जितनी ही गहरी होगी उतनी ही व्याकुल भी होगी । इसीलिए कविता में कहा गया है कि प्रेम की जमीन वैचारिक रुप से बहुत ठोस है इसके मायने हैं कि अब इसमें फिसलन नहीं ,इसमें स्तर हीन प्रदर्शन और दिखावा नहीं यह तो अन्तर मन ,आत्मा के भीतर तक पहुंचा हुआ भाव है , अनुभूति और अनुभव है ।प्यार देखा जा रहा है विचार के स्तर पर , महसूस किया जा रहा है आत्मा के भीतर और विचार की जमीन पर बहुत बहुत गहरा भावनात्मक अहसास से भरा है ।प्रेम का केवल कोरा अनुभव भोग की सीमा पर जाकर ठहर जाता है लेकिन आत्मिक स्तर पर महसूस किया गया प्रेम वैचारिक होता है । इसमें भोग लिप्सा की आतुरता नहीं रहती वरन योग की स्थिरता से यह मनोयोग बन जाता है । यह भाव सम्पदा मन और आत्मा की चेतना से उपजती है ।प्यार ,लगाव और प्रेम स्थिर और चेतना के स्तर पर प्रतिष्ठित होता है । इसमें तन ,मन और आत्मा का निमज्जन होता है ।देहानुभूति गौण और आत्मिक अनुभूति ही प्रमुख बन जाती है ।यह चेतना , संवेदना के स्तर से किया गया अनुभव है जिसमें प्रेम को दूरदृष्टि से युक्त करके महसूस किया जाता है । प्रेम में त्वरा नहीं वरन आत्मा का करुणा मय निमज्जन और स्थिरता है ,धीरज है ।प्रेम में आदर्श और सपने संजोया व्यर्थ है प्रेम तो स्फूर्ति और कर्मशील होता है ।प्रेम की वास्तविक उपलब्धि तो निरंतर कर्मण्य होती है ।जो लोग प्रेम हो जाने के बाद निकम्मे हो जाते हैं वे प्रेम का सच्चा अनुभव और मकसद नहीं जानते ।जो कर्म से प्रेम के अनुभव को जोड़ कर देखते हैं वे ही प्रेम का वास्तविक अर्थ समझते हैं ।प्रेम होना और प्रेम में डूब कर नित्य कर्म में उद्यमी प्रवृत्ति को समाहित कर लेना ही प्रेम की सच्ची प्रेरक अवस्था है ।यही है—” चलने की हद तक चलना ” का भाव जो निरंतर कर्म के लिए प्रेरणा दे ।यही है वैचारिक स्तर पर किया गया प्रेम ।प्रेम सोद्देश्य होना चाहिए ।भोग के लिए किया गया प्रेम स्तर हीन और सतही होता है लेकिन जिसमें विचार की ठोस जमीन पर प्रेम प्रकट होता है वह संसार सृजन के लिए उपयोगी होता है ।इस तरह का किया गया प्रेम समाज उन्नयन के काम आता है ।प्रेम की अनुभूति निठल्ला नहीं वरन कर्मलीन बनाती है । इस तरह विचार के साथ उपजा प्रेम सार्थक होता है ।प्रेम कोरी कल्पना नहीं होता वरन उसमें यथार्थ का ज्ञान भी समाहित होना चाहिए तब ही वह ठोस होता है और दृष्टिसम्पन्न भी होता है ।प्रेम को लेकर की गई कल्पना और स्वप्न देखना दोनों ही व्यर्थ समय बर्बाद करने जैसा है ।विचार पूर्ण प्रेम ही सत्य की जमीन से जुड़ा प्रेम है ।हर स्त्री और हर पुरुष को अपने मन में प्रेम की अनुभूति और अनुभव से पहले यह विचार करना बेहद जरुरी है कि— मैं फलां स्त्री या पुरुष से प्रेम क्यों करती हूं / करता हूं ? इस सवाल का जवाब ही सत्य के सोद्देश्य प्रेम की अनुभूति और अनुभव से स्वत: जुड़ जायेगा ।प्रेम कल्पना नहीं होता लेकिन जब प्रेम हो जाता है तो नई नई कल्पना उसमे भर जाती है ।नये सपने उसमें जागने लगते हैं । यही प्रेम का अनुभव है ।
विनीता रघुवंशी ।
