आज की कवितामत करो by Dr. Vinita Raghuvanshi 14/05/2021 written by Dr. Vinita Raghuvanshi 14/05/20218मत करो********मोड़ चाहे सफर के होंया सड़क के -भले लगते हैंगुजर करके सुरंगों सेआ रहे वे लोगहो चुका जिनके जेहन मेंआत्मघाती रोगजहाँ देखो वहीं से वेगले लगते हैंबढ़ गये जो। भुलावों मेंमरुथलों की ओरजिन्दगी के साथ जिनकीबँध न पाई डोरपाँव उनके हर जगह सेजले लगते हैंमत करो ऐसे नजारेगम बढे़ जिससेमत भरो ऐसे उजालेतम बढे़ जिससेकौमियत की कोख में जोपले लगते हैं ।।(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के गीत संग्रह “मुक्ति के शंख ” से उद्धृत ) 0 comments 0 FacebookTwitterPinterestEmail Dr. Vinita Raghuvanshi previous post उगती सुबह का गीत next post तुम्हीं बताओ You may also like नाले का जनेऊ पहने पहाड़-पकी फसल के बीच 31/08/2025 वो देखो !-पकी फसल के बीच 30/08/2025 अभी अभी नाले में हिरनियां-पकी फसल के बीच 29/08/2025 लोकगीतों की तरह-पकी फसल के बीच 28/08/2025 नाले में जो बह रहा-पकी फसल के बीच 27/08/2025 सप्तपदी की श्वेत जटाओं से-पकी फसल के बीच 26/08/2025 सुबह भाप छोड़ता-पकी फसल के बीच 24/08/2025 पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता-पकी फसल के... 23/08/2025 ताजी ताजी-पकी फसल के बीच 22/08/2025 बांस वन के घोंसलों से-पकी फसल के बीच 21/08/2025Leave a Comment Cancel ReplyYou must be logged in to post a comment.