आज की कविताउगती सुबह का गीत by Dr. Vinita Raghuvanshi 13/05/2021 written by Dr. Vinita Raghuvanshi 13/05/20216भोर भयी,अलसाये स्वप्न सब बिसार देछितराये बालों को फिर से सम्हाल लेदेख तेरे द्वारे पे ज्योति पुंज आये हैं !बीती है अन्ध निशापुलकित है दिशा -दिशामलया ने गंध मलीमहकी हैं गली -गलीबगिया में सौरभ ने ताजगी बिछाई हैफूलों ने नये -नये छन्द अब झराये हैं !!चिडियों ने गीत गढे़सूरज ने जाल मढे़अम्बर से रात छंटीधरती माँ जाग उठीगीता के माधव की बज रही बांसुरीकर्मयोग घर -घर के आँगन पे छाये हैं ! !(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के गीत संग्रह ” अँजुरी भर घाम “से उद्धृत ) 0 comments 0 FacebookTwitterPinterestEmail Dr. Vinita Raghuvanshi previous post घर -घर तुम बिखराओ फूल next post मत करो You may also like नाले का जनेऊ पहने पहाड़-पकी फसल के बीच 31/08/2025 वो देखो !-पकी फसल के बीच 30/08/2025 अभी अभी नाले में हिरनियां-पकी फसल के बीच 29/08/2025 लोकगीतों की तरह-पकी फसल के बीच 28/08/2025 नाले में जो बह रहा-पकी फसल के बीच 27/08/2025 सप्तपदी की श्वेत जटाओं से-पकी फसल के बीच 26/08/2025 सुबह भाप छोड़ता-पकी फसल के बीच 24/08/2025 पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता-पकी फसल के... 23/08/2025 ताजी ताजी-पकी फसल के बीच 22/08/2025 बांस वन के घोंसलों से-पकी फसल के बीच 21/08/2025Leave a Comment Cancel ReplyYou must be logged in to post a comment.