Home आज की कविताखिलखिलाती नदी

खिलखिलाती नदी

by Dr. Vinita Raghuvanshi
खिलखिलाती नदी
****************
चिन्ता में डूबी नदी
सूखकर काँटा होती
चिढ़चिढी़ होते ही
रुक जाती धार
और क्रोध से
बन जाती रेत
ओ ! मेरे गाँव की नदी
हँसती रह हरदम
हरदम हँसती नदी
हर हाल में
पानीदार नदी होती है !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” नहीं रहने के बाद भी ” से उद्धृत )

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More