आंगन
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( ९ )
उठा लो
बहुमंजिले भवन
पर कहां रचोगे घर ?
जहां होते सबके
एक जैसे मन – आंगन !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज वर्तमान का सबसे बड़ा सवाल है आत्मीयता और लगाव का स्नेह की कमी के अनुभव से रिक्त मन ।कुछ खाली पन जो कभी भरता नहीं ।मन की गहराइयों में उतर कर खोजता मन जहां प्यार का , लगाव का नजदीकी रिश्ता मन को अहसास से भर दे ।चारों तरफ बस धन – धन ,माया ,पैसा पैसा का हाहाकार सुनाई देता है ।धन की अहमियत इतनी बढ़ गयी कि आदमी का प्यार ,प्रेम सब उसके सामने बौना हो गया ,महत्वहीन हो गया ।मन ,आत्मा अपने अस्तित्व को मिटता देख रहे हैं ? यह बहुत ही कड़वी सच्चाई है कि आदमी आज आदमी की बेकद्री करके खुश हो रहा है ? उसने अपने स्वार्थ में अन्धा होकर अपने आत्मीय और स्वजन की घनघोर उपेक्षा की । उन्हें घर से खदेड़ा और वृध्द आश्रम पहुंचा दिया । बच्चों को होस्टल पहुंचा दिया ।स्त्रियों को दफ्तर में बैठाया और उनसे ममत्व और सेवा के भाव ,गृहस्थिन के दायित्व सब छीन लिये । वे कठपुतली बनी बाजार के इशारों पर नाचने लगी ।इस तरह “घर” मकान में तब्दील हो गये ? घर के मायने आज रात्रि – विश्राम के लिए बनी चारदीवारी भर हो गयी ,या स्नान , शौच के सुविधा घर भर बनकर रह गये ? मकानों में से घर की आत्मीयता ,आव भगत ,अतिथि सत्कार, आग्रह ,मान मनौव्वल ,मनुहार सब के भाव अपना अस्तित्व समेट कर विदा हो गये ।बस बचा तो धन का ,भौतिकता का वैभव ,सामग्री , और उनमें उलझा मनुष्य का सुविधा जीवी भोगी मन । जहां त्याग नहीं भोग महत्वपूर्ण हो गया ।एक के लिए दूसरा अपने सुख सुविधा को छोड़ नहीं सकता ।आज के वर्तमान परिवेश में साझा कुछ नहीं है ? न सुख- सुविधाएं न भौतिक संसाधन ? खुद अपने जीवन की निजता में भी हिसाब – किताब , मिजाज बैठाना , गणित लगाना , ये सब मानवीय नहीं यांत्रिक है और भौतिक जीवन की यंत्रणा भी है । घर का ,आंगन का अर्थ होता है जीवन की सहजता ,सहजता से दूसरे की ,पराये की स्वीकृति , साझा लगाव , साझा जीवन विचार ,साझा आंनंद ।आज की भौतिकता ने घर के ये मायने हमसे छीन लिए हैं ।हम परस्पर किसी के लिए कुछ नहीं करना चाहते हैं ।कबीर के शब्दों में कहें तो —-” सांई इतना दीजिए ,जा में कुटुंब समाये । मैं भी भूखा न रहूं ,साधु ने भूखा जाये।।” यह मांगने की चेतना भी वर्तमान में लुप्त हो गयी है ।यदि घर है तो आंगन भी है जिसमें चिड़िया है ,गिरगिट है ,गिलहरी है ,कबूतर है , कौंवे भी हैं , चींटी है ,कुत्ते – बिल्ली और गाय भी है ये सभी तो मनुष्य के कुटुंबी हैं ।साधु और संत -सज्जन भी हैं ,चांद ,सूरज और तारे भी हैं , , खुद आदमी भी है और परिजन भी हैं ।यह मांगने की चेतना ही तो घर का दर्शन है ,विचार है ।घर एक बहुत गंभीर चेतना है ,एक मनोवैज्ञानिक संवेदना है ।जो प्रहार नहीं करती जो संरक्षण करती है ।सबका चींटी से लेकर मनुष्य तक का ? घर है तो सब सुरक्षित हैं यह मान लिया जाता है क्योंकि घर का अर्थ केवल छत नहीं वहां रक्षण की चेतना और संवेदना का मर्म बसा होता है । घर में हर एक के लिए सब कुछ होता है ,सबका साझा अस्तित्व और अस्मिता होती है । घर एक अनवरत विचार और उदारता का दर्शन होता है ।बहुमंजिला इमारतें भले ही मनुष्य के वैभव पूर्ण जीवन का प्रमाण हो सकती है लेकिन वह घर के अर्थ को प्रकट नहीं कर सकती ।उनका वैभव निस्संदेह सीमित होता है उनमें परिजन बंधन में जीवन बिता सकते हैं लेकिन मन रुपी आंगन का खुला और उदार लोक तो घर के आंगन में ही रचा जा सकता है ।घर की आत्मा आंगन में ही विराजमान रहती है । जीवन का एकाकी पन भले बहुत अच्छा हो किन्तु मन का साझा पन तो आंगन में ही खुल और खिल सकता है ।
🙏 विनीता रघुवंशी
आंगन- तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
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