Home कविता तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

वह **** ( ९ ) वह सदा से अन्य पुरुष सर्वनाम ही रहा मध्यम ने पीसा उत्तम ने बरसाये कोड़े अब उसे —– भाव वाचक संज्ञा बनाया जा रहा प्रत्ययों …

वह **** ( ४ ) चिलम का कंकर साफ करते हुए वह देखता है भर दुपहरिया में आट्या – पाट्या खेलते बच्चे कि जिनका संसार चिड़ियों की चहक जैसा तोड़ …

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