प्रस्तुत ****** ( १ ) प्याले में गर्ल लिए आये थे नीलकंठ किन्तु उस समय पर थे घर भर के द्वार बन्द लिख गये दीवार पर वे रक्त से जग …
तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
वह **** ( ९ ) वह सदा से अन्य पुरुष सर्वनाम ही रहा मध्यम ने पीसा उत्तम ने बरसाये कोड़े अब उसे —– भाव वाचक संज्ञा बनाया जा रहा प्रत्ययों …
वह ( ८ ) उसने देखा कि बड़ी बऊ के आंगन में खिल रही कली और गांव भर के उछ्ट्टे छोकरों की नीयत खराब है देखते – देखते एक दिन …
वह **** ( ७ ) वह सोचता कि जमीन का पट्टा तो उसे भी चाहिए हवा के बिना फेफड़े कहां से लेंगे ऊर्जा अन्न के बिना कहां से मिटेगी भूख …
वह **** ( ६ ) वह सोचता कि जब खेल रहे हों बच्चे तब नहीं फोड़े जाने चाहिए बम बच्चों की किलकारियां सदा – सदा को कर देनी चाहिए निर्भय …
वह *** ( ५ ) इधर अपनी मेहरारु के साथ खेत नींदता वह उधर मेड़ की हरी दूब पर खेल रहे बच्चे तभी एक राकेट निकला धुएं की लकीर खींचता …
वह **** ( ४ ) चिलम का कंकर साफ करते हुए वह देखता है भर दुपहरिया में आट्या – पाट्या खेलते बच्चे कि जिनका संसार चिड़ियों की चहक जैसा तोड़ …
वह ***** ( ३ ) दिन भर अच्छा लगा हजार – हजार हाथों से दिल खोल कर रोशनी जो बांटी सूरज ने बहुत बुरा लगा उसे गांव के मंदिर का …
