Home आज की कविताप्रस्तुत-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

प्रस्तुत-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
प्रस्तुत
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( १ )
प्याले में गर्ल लिए
आये थे नीलकंठ
किन्तु उस समय पर थे
घर भर के द्वार बन्द
लिख गये दीवार पर वे रक्त से
जग नहीं पाये अभी तक वक्त से !
साथ में मीरा ,दयानंद और थे सुकरात
थी सभी के हाथ में मेरे लिए सौगात
सौगात : जिसका अर्थ केवल आग
आग ; जिसका अर्थ ज्वालामुखी का पर्याय
और सबका अर्थ केवल क्रान्ति
किन्तु मुझको तो
विरासत में मिली दिग्भ्रान्ति
आज उनको सब तरफ से झाड़
युध्द को प्रस्तुत हुआ हूं वस्त्र सारे फाड़ !
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — “ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
युग में हर समय बहुत से सत्य रहस्य बन कर उभरते रहते हैं । हर बार आत्म चेतस व्यक्ति को ही समाज के लिए अपने आपको न्यौछावर करना पड़ता है ।नीलकंठ से लेकर स्वामी दयानंद ,मीरा ,सुकरात आदि कई मनीषियों को , चिन्तकों को युग सत्य प्रकट करने के लिए गर्ल पान करना पड़ा ।यह संघर्ष आत्म संघर्ष और जन संघर्ष दोनों के लिए ही संभव हुआ ।हर बार मनुष्य की चेतना अन्याय ,अनियम, अमानवीय व्यवस्था के प्रतिरोध के लिए आतुर रही है ।जब देव और दानव का संघर्ष हुआ या भोग और भक्ति के लिए संघर्ष हुआ हो या समाज में सुधार की नई मिसालें रची जा रही हो उस समय यह व्यवस्था का विरोध माना गया । सत्ता ने चाहे वह पारिवारिक सत्ता के अहंकार को चुनौती हो या समाज की सत्ता को चुनौती हो या राज्य व्यवस्था के सत्ता शीर्ष को चुनौती हो तब तब इन सब सत्ताओं ने चेतना वान नेतृत्व की आवाज दबाने के लिए जहर के प्याले का प्रयोग ही किया ।यह आत्म चेतना और जंग- जन चेतना के संघर्ष ही ज्यादा रहे ।जब जब जन – चेतना संघर्ष और बदलाव के लिए प्रस्तुत हुई तब तब उसे दिग्भ्रमित ही किया गया ।जन मानस को हर समय भ्रम ही सौंपा गया वहां सत्य पर आवरण डाला गया ।सत्य प्रकट करने वाली चेतना को जहर देकर मार दिया गया ।सच बाहर आने से जनता के जागरुक होने से पहले ही उसकी चेतना को सुलाये रखा गया ।नीलकंठ पहले सत्ता विरोधी चेतना वान नेतृत्व था लेकिन सभी भ्रम की निद्रा में निमग्न थे । इसीलिए नीलकंठ ने दीवार पर अपने लहू से संदेश लिखा कि अभी तक वक्त से जाग नहीं पाये ? वक्त याने समय को समझ कर जागना आत्म चेतना वान बन जाना ।वक्त याने भ्रम की नींद में सोये रहना । यथास्थिति में पड़े रहना ।मोहक स्वप्न में उलझे रहना ? अच्छा समय आयेगा ।वक्त आता नहीं है उसे लाया जाता है ? ज्ञान से ,बोध से ,सत्य के प्रकाश से ? वह सहज ही नहीं आता उसके लिए आत्म संघर्ष करना बहुत बहुत जरुरी है ।अपने भीतर के आत्म बोध को जागृत करना बेहद जरूरी है । सामाजिक बदलाव के लिए हर मनुष्य का वैचारिक बोध का बदलाव होना बहुत जरुरी है ।यह जानना भी बहुत जरुरी है कि सामाजिक बदलाव केवल जहर के कड़वे घूंट पीने पर ही संभव है ।यह बदलाव की मिसाल मीरा ,सुकरात और स्वामी दयानंद को मिली सौगात याने जो उपहार मिला वही हर बदलाव चाहने वाले को भी मिलेगा । आग है जो चेतना का प्रतिरुप है ।यह चेतना ही बदलाव की हिमायत करती है । आज व्यवस्था का हर वर्तमान एक गहरे भ्रम में डूबा हुआ है क्या राजनीति ,क्या अर्थ व्यवस्था,क्या शिक्षा ,क्या समाज चेतना ,क्या अध्यात्म,क्या धर्म ,क्या नैतिकता ,क्या मानवीय मूल्य, क्या सेहत ,क्या योग ,क्या चिकित्सा ,क्या न्यायपालिका ,क्या कार्यपालिका ,क्या विधायिका ? जहां से भी भ्रम,मिथ्या ,झूठ और भ्रष्टाचार को मिटायेंगे वहीं से मूल्य चेतना ,विचार और सत्य के प्रतिरोध शुरू हो जायेंगे ।जब भी संघर्ष की चेतना जागेगी तब तब भ्रान्ति को सबसे पहले मिटाना होगा ? उसे झाड़ना पड़ेगा ।सत्य पर चढ़े सभी भ्रम के आवरण को फाड़ना पड़ेगा ।तब ही युग सत्य सबके सामने आ सकेगा ।सत्य हर समय निर्वस्त्र ही होता है ।सच कड़वा भी होता है बिल्कुल जहर की तरह ।हममे बस सत्य और भ्रम में अन्तर की चेतना जागनी चाहिए ।अन्यथा सब भ्रम के भुलावे हैं जहां हम अपने ही आनंद में खोये रहेंगे ।कबीर ने भी कहा है —” सुखिया सब संसार है ,खावे अरु सौवे।
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रौवे ।।
आत्मबोध हीन मनुष्य में और आत्म चेतस में यही फर्क है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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