Home आज की कविताप्रिया-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

प्रिया-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
प्रिया
*****
( १ )
मैं रोज – रोज देखता हूं आदमी की मौत
रोज – रोज देखता हूं
आदमी की लाश पर पैदा होती भीड़
ये भीड़ सिर हिला -हिला कर
गिरगिट की तरह बदला करती रंग
और बाजार बन कर डूब जाती शोर में
ट्रांजिस्टर लटकाये
सिनेमा ,दूरदर्शन ,केसिट से चिपकी
चीखती – चिल्लाती सड़क हो जाती है
कभी चुक जाती समाचार बनकर
रातों – रात पैदा होने वाले अखबारों की तरह
और कभी माथे पर उठाये घर मकान
अर्राकर बिखर जाती मलबे की तरह
कीचड़ से खेलती है भीड़
जुलूसों ,सभाओं में चलती
फेंकती दर्पणों पर धूल
ये भीड़ सभी को खींच कर
कर लेती अनुकूल
भीड़ के इस माहौल में
कैसे रखूं जिन्दा आदमी को
यही सोच रहा इन दिनों में
तुम भी —–
इसी सोच में डूबी होगी प्रिये!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता गहरी संवेदना और गंभीर विचार की पृष्ठभूमि पर अपनी रचनात्मक दस्तक दे रही है । आदमी की मौत याने उसके भीतर की संवेदना का बोध का खत्म हो जाना ।वह किसी भी हादसे ,दुर्घटना ,या मौत के अवसर पर गहराई से शोकाकुल नहीं होता ।समाज में घटती कोई भी घटना उसके चित्त को विचलित नहीं करती ? वह बस यों ही लगातार अपने आप में डूबा रहता है ? यह रोज रोज आदमी को मरता देखना भी विचारणीय है ।समाज में जो भी व्यक्ति चल फिर घूम रहा है वह इतना स्पन्दन हीन और सतही हो गया कि आदमी के साथ होते हुए हर हादसे,घटना ,दुर्घटना ,या उसके साथ होती हिंसा से आदमी की चेतना विचलित नहीं होती वह क्षणे क्षणे चुप्पी साधे रहता है ।उसके भीतर की विचार करने की शक्ति ही जैसे निर्वाक हो गयी है ? वह जीवित तो है लेकिन विचार विहीन एक पुतले की तरह ।सब कुछ सहता हुआ । वह विचार करना ही भूल चुका है कि किसी भी बड़े हादसे पर ,घटना पर , उसे क्या करना चाहिए ? क्या कहना चाहिए ? किस तरह शोक को क्रोध में बदलना चाहिए ? हर हादसा एक सवाल बनकर समाज में जीवित लोगों को हिला सकता है लेकिन मौत के सारे मंजर आदमी को भीतर तक झकझोर नहीं पाते ? मन में सवाल उठता है कि समाज का हर व्यक्ति इतना खुदगर्ज और अपने स्वार्थों में खो गया है कि वह जिन्दा भी है या नहीं ? यह विचारणीय और चिन्तित करने वाला विषय है ।हमारा समाज केवल भीड़ का स्वरुप धारण कर चुका है ? जहां विचार चेतना और जीवन के मूल्य खतम हो चुके हैं ।यह तो खावे अरु सोवे की तन्द्रा में डूबा है ।इसके साथ होते बड़े बड़े हादसे इसे निर्वाक बनायें रहते हैं ।समाज की यह स्पन्दन हीन अवस्था चिन्ता जनक है ? क्षणे – क्षणे उसकी फिक्र,चिन्ता ,बेचैनी सब मौन होती जा रही है ।वह किसी भी तरह से अपने आसपास के माहौल ,वातावरण ,को महसूस नही कर पाता इसलिए ऐसा अहसास हो रहा है कि समाज निष्प्राण लोगों का जत्था या भीड़ में तब्दील हो चुका है जिसके अलग अलग स्वार्थ और अलग – अलग मकसद हैं ।आदमी की मौत को महसूस करना यह बड़ा ही संवेदनशील मसला है । यहां मौत उस अर्थ में नहीं है जिस तरह आदमी लाश या शव में पड़ा रहता है । यहां तो आदमी की चेतना ,संवेदना ,फिक्र ,बेचैनी का मर जाना है याने मानसिक और चेतना गत मृत्यु हो जाना ।समाज में कुछ भी हो ,परिवार में कुछ भी हो , राष्ट्र में कुछ भी हो हम सब कुछ होते हुए ,गुजरते हुए देखते रहेंगे ? क्या यही हमारी राष्ट्रीय चेतना का जिन्दा होना है ? क्या यही हमारी देश भक्ति की मिसाल है? यही राष्ट्र आराधन का प्रमाण है ? वर्तमान में समाज केवल उपभोक्ता समाज है ? उसकी चेतना नष्ट हो चुकी है ।वह मनोरंजन के संसाधनों से चिपकी एक बहरी ,मूक ,शोर करती भीड़ भरी सड़क भर है ? सिर्फ आवाजें हैं ? जिनमें विचार नहीं है ? जिनमें शोर भर है ? क्या कहा जा रहा ? क्या सुना जा रहा ? क्या चाहिए ? क्या नहीं चाहिए? इसका कोई सिलसिला नहीं है ? यह शोर ? ये आवाजें कहीं से भी शुरू और कहीं भी ,किसी भी समझौते पर खतम ? दिलासे हैं ? सांत्वना है ? धीरज है ? खामोशी है ? लेकिन सब दिशा हीन ? सब अजनबी आवाजे ? कभी ये आवाजें घर – मकान को शोर करके अपने माथे पर उठा लेती और कभी ग़म में डूब कर होशों हवास खो देती ।एकाएक ढह जाती आवाजें ? कीचड़ से खेलती ये भीड़ ? कौन सी भीड़ है जो हमारे आदर्शों पर धूल फेंक रही है ? यह एक संकेत है ? यह इंगित किनके लिए जो माफिया है राजनीति का ये उनकी ओर संकेत है ।जिसे आज हम ट्रोल आर्मी के नाम से जानते हैं ? क्या ये कीचड़ याने गंदगी से खेल रहीं हैं ? वाणी से गंदगी उछाल रही है ? हमारे आदर्श व्यक्तित्वों पर ,हमारे जन नायकों पर विभिन्न और विविध दोषारोपण करके उनकी राष्ट्र भक्ति में कमियां निकाल कर उनके राष्ट्रीय ,सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक संघर्षों से भरी चेतना को समर्पित विचारों पर वैचारिक गंदगी फैला रही है ।यह विचार शून्य भीड़ हर एक को खींच खींचकर अपने अनुकूल उनका इतिहास गढ लेती हैं । इतिहास को खण्डित कर के उसके टुकड़ों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने वाली यह भीड़ और कुछ नहीं राजनीतिक स्वार्थों और सत्ता पर बने रहने के सुख के भ्रम को फैला कर जनता को गुमराह कर रही है ? इस तरह चेतना विहीन समाज ही तो मृत समाज है ।यही मृत अवस्था ही तो चिन्ता जनक है ? राष्ट्र का अर्थ इस तरह समाप्त हो रहा है ।हम जातियों , सम्प्रदायों में विभक्त समाज के टुकड़े हैं ? पूर्ण समाज नहीं ? समाज की इस अवस्था पर विचार ,चिन्तन, चिन्ता- फिक्र, की जाना चाहिए ।प्रिय और प्रिया के समान चिन्तन की परिभूमि पर रची यह कविता समयानुकूल है ।समाज को अपनी राष्ट्रीय चेतना में बदलाव करना होगा ।वह जातियों का,धर्मों का समूह नहीं वरन सम्प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र है ।जिसका भौगोलिक अस्तित्व है ।जिसका एक सुनिश्चित संविधान हैं ।जिसकी राजनीतिक,सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक ,न्यायिक स्वतंत्रता समान रुप से प्रत्येक नागरिक को निर्बाध प्राप्त है ।इस तरह की विचार शून्य स्थिति चिन्ता जनक है ।समाज जागरुक बनें और उसमें चेतना का ,नागरिक चेतना का स्पन्दन लौटे तब ही राष्ट्र की वास्तविक जीवन शक्ति का अहसास होगा। 🙏 विनीता रघुवंशी

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