10
विनीता रघुवंशी
प्रस्तुत
********
( २ )
धूप के माथे उठा कर
धुएं की शिकने
अब न जायेगी कहीं भी रोशनी बिकने
अब न अन्ना बटेरों को खायेगा
अब न बौनापन शिखर तक जायेगा
कुछ कृतघ्नी सीपियां
जो पी गई नक्षत्र पूरा
स्वार्थी कुछ मेघ जो
अब भी निगलते हैं सवेरा
शीघ्र ही गल कर मिटेंगे
या स्वयं ही पथ से हटेंगे
शिराओं में जम गया था बर्फ
अब वे उगलती लावा
खूब बहकाई गई भोली हवाएं
किन्तु उनको
अब नहीं बर्दाश्त कोई भी भुलावा
इसलिए मैं
हो गया हूं क्रांति को तैयार
नई रचना के लिए
बनकर सृजन की धार !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज हम प्रस्तुत हैं हर बदलाव के लिए ।इस बदलाव को लाने के लिए हमारे समाज को , व्यक्ति को जहर ही क्यों न पीना पड़े उसके लिए हम तैयार हैं । कविता में स्वार्थी तत्वों की ओर इशारा है । बहुत से संकेत हैं उन खुदगरजी व्यवस्थाओं और व्यक्तियों की तरफ जो संस्थाओं को जन विरोधी बनाने पर आमादा हैं ।उन नीतियों और नियमों को ध्वस्त कर रही हैं जो जन हितैशी हैं ।ये सब संकेत है जो वर्तमान राजनीतिक , सामाजिक , आध्यात्मिक,धार्मिक व्यवस्थाओं का संचालन मानव विरोधी दिशा में बह रहा है । इन सब व्यवस्था का प्रचार – प्रसार समाज की बुनियाद को नष्ट करने वाला है ।सामाजिक सौहार्द्र को बिखेरने वाला है । वर्तमान में धर्म को केन्द्र में रख कर जो कुचाल , कुटिलता की जा रही है उससे समाज का सृजन नहीं वरन बंद अमनी का ही चलन बढ़ेगा ।समाज का हर निवासी बेभरोसाई, अविश्वास , खतरों के बीच अपने आपको महसूस करेगा ।यह कुटिलता घनघोर रुप से समाज विरोधी है ।इस सबको बदलने के लिए ही कटिबध्द होना रचना का मर्म है ।पुरातन काल से चली आ रही सभी व्यवस्थाएं , संस्थाएं , लोक व्यवहार ,धर्म, राजनीति ,अर्थ नीति , समाज नीति , न्याय नीति सभी जन संरक्षण के हित ही उपयोग की जाती रही हैं । लेकिन आज पश्चिम के विचारों और व्यवस्थाओं से प्रभावित नेतृत्व कारी शक्तियां मानव जीवन और उसके संसाधनों के विरोध में संलग्न है ।अत्यधिक यांत्रिकता ,भौतिक विज्ञान का प्रयोग मनुष्य को एक ओर तो शक्तिशाली बना रहा है दूसरी ओर वह घनघोर मशीनीकरण से विवश ,लाचार ,और बेबस है ।मानव विकास की समग्र धारा मानव विरोधी ही है । नदियां सूख रही हैं , धरती का जल स्तर घट रहा है ,वायु प्रदूषित है , आकाश धुंध में रोशनी की चमक खो चुका है ।सागर का पानी जहरीला हो चुका है ,खेत की मिट्टी में उर्वरता खतम हो रही है , अन्न , जल, धरती आकाश वायू सब प्रदूषण के तत्व बने हुए हैं । मनुष्य का स्वभाव और प्रकृति भी आज असहिष्णु , अनुदार, हिंसक ,लालसा से लपलपाती हो चुकी है ।बदलना तो यही है कि मनुष्य का मूल स्वभाव और प्रकृति में उदारता ,अहिंसा, सहिष्णुता आ जाये । मनुष्य संसार के प्रत्येक प्राणी का , यहां तक जीव मात्र का संरक्षक और परस्पर जीवन का संरक्षण करने लगे । बदलाव में सृजन हो हिंसा से भरी पशुता न हो ।यही बदलाव तो वास्तविक बदलाव है । मनुष्य का हिंसक होकर पशु बल में विश्वास करना उसका पतन ही है ।मन ,बुध्दि ,चेतना ,आत्मा का करुणा मय हो जाना ही मनुष्य हो जाना है । यही बदलाव मनुष्य जीवन की सार्थकता है । यही बदलाव धर्म युक्त जीवन है ।धर्म मनुष्य का रक्षक है यह चेतना ही धर्म विरुद्ध है कि मनुष्य धर्म का रक्षक है । आज वर्तमान में यह भ्रम तेजी से प्रचारित किया जा रहा है कि धर्म की रक्षा मनुष्य के द्वारा की जायेगी ? वह धर्म नहीं स्वार्थ है ? वह हिंसा में डूबा विचार है । इस हिंसा के जाल से मुक्त होना ही बदलाव है ।समाज में से ऐसे खुदगर्ज ,स्वार्थी लोग स्वत: विपथ हो जायेंगे । अहिंसा का विचार ही समाज हितैषी है ।यही वैचारिक परिवर्तन समाज के पक्ष में है ।इसी दिशा में समाज को गतिशील होना चाहिए ।
