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विनीता रघुवंशी
प्रिया
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( २ )
यूं तो तुम नाज़नीन रही हो हमेशा से
लेकिन खतरों के बीच इतनी जल्दी
फन उठाए कर फुत्कारती नागिन बन जाना
एक ऐसी मुद्रा है तुम्हारी
कि जिसे देख मुझमें
और – और जाग गया है शिवत्व !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
स्त्री की कोमलता जग जाहिर है ।भले दुनिया की अधिकतर महिलाएं सृजन के बड़े बड़े बोझ अपने छोटे से अस्तित्व पर थामे रखती हैं ।दुनिया के हर निर्माण में वह शामिल हैं । लेकिन जब कोमलता की बात होती है तो उसे अबला ,कमजोर और नाज़नीन कहा जाता है ।उसको बहुत ज्यादा नाजुक समझा जाता है ।हर बार कहा जाता है —” तुम रहने दो, यह तुम से न हो सकेगा ” यह जुमला अक्सर मर्द स्त्री को नजाकत वाली दिखाने के लिए प्रयोग करते हैं । स्त्री भी संसार का सबसे कठिन कर्म संतान को जन्म देने का ,प्रसव की पीड़ा को सहने का जिम्मा आसानी से उठाती है ।यह उसका गौरव और पूर्णता का अहसास ही तो है । जहां उसकी अस्मिता सृष्टि की लघुता से विराट रुप धारण करती है । वह स्त्री से मां ,जगत जननी बन जाती है ।यह उसका नाजनीन, नाजुक ,कोमल ,सहृदया, करुणामई के विराट रुप को समाहित कर देती है ।यह उसकी भावनात्मक रूप का विस्तार है ।किन्तु जब इसी स्त्री की संतान या अन्य प्रिय संबंध पर संकट मंडराता है तो वह उसके रक्षार्थ फुत्कारती नागिन का विकराल रुप धारण कर लेती है ।यह है स्त्री और पुरुष का परस्पर संबंध ।जो सीमा से असीम हो जाता है ।एक की लघुता दूसरे को सर्वव्यापी बना देती है ।प्रिया का कोपमय रुप प्रिय को कल्याणकारी बना देता है ।यह रुप के धारण की अवस्था ही तो है जो सर्व कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करती है ।यह कोप ,यह क्रोध ,यह समस्त भूमंडल पर व्याप्त आचरण की भ्रष्टता को मिटाने की कल्याण भावना ही तो शिवत्व है ।समाज में बिछी हुई दुराचार का लोक व्यवहार ही तो वह दिशा संकेत है जहां स्त्री अपनी कोमलता ,नजाकत, नाजनीन,और नाजुक मिजाज को छोड़कर फन उठाती नागिन में बदल जाती है ।यह बड़ी चेतना वान कल्पना है ।जो नजाकत छोड़ कर बेहद विकराल रुप धारण कर लेना ही पुरुष की प्रेरक प्रिया है जो दिशा का संकेत और इंगित कर रही है शिव के तांडव की , शिव के सत्य ,सुन्दर, और कल्याण मय स्वरुप की रचना में शामिल हैं ।यह एक सामान्य पुरुष की वह वैचारिक आत्मानुभूति है जो प्रिया के विराट में से पुरुष की विराटता का उदय हो जाना या जाग जाना है ।स्त्री यहां कोमल नहीं वरन वैचारिक रुप से सुदृढ़ है ।वह पुरुष की चेतना को वैचारिक बदलाव से जोड़ने वाली शक्ति रुपिणी है । इसीलिए संसार में उसकी महत्ता कमजोर नहीं वरन दृढ़ है ।वह अपनी अस्मिता के धागों से पुरुष को शिवत्व प्रदान करती है ।वह प्रेरणा है समग्र जगत की। समाज में घटित होते हर खतरे को भांप लेना इसी नाज़नीन की चेतना का परिणाम है ।इसी की संवेदनशीलता ही , सहिष्णुता ही वह ताकत है जो समग्र सृष्टि के रचयिता को कल्याण के मार्ग का अनुसरण करने के लिए आत्म प्रेरणा देती है ।
