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प्रिया
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( ३ )
आजकल तुम
सभी से हंसती – बतियाती हो
सभी के सुख – दुख में
होती हो शरीक
प्यार की वो—-
व्यक्तिगत लीक
कितनी फूहड़ है प्रिये
कि जिसके
शिकंजे में जकड़े
तलवार और म्यान की तरह
रहते हैं लोग
हमारा प्यार
म्यान या पेंटी में रखा
खड्ग नहीं
यह तुमने किया
यह तुम ही कर सकती हो !
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
प्यार एक खुबसूरत भावनात्मक स्थिति है । जहां मनुष्य ही नहीं वरन हर प्राणी उस विश्वास भरे अहसास को महसूस करता है ।यह प्रेम की निष्ठा और समर्पण ही है जहां एक है दूजा नहीं ।याने इतना सामीप्य की पराया पन की भाव दशा समाप्त हो जाती है ।इतना गहरा अपनत्व कि जहां कोई दुविधा ही नहीं अपनाने में । यह समाज के लोगों से ,व्यवहार जगत से घुलना – मिलना और अपने प्यार की निजता में उसे भी समेट लेना । जहां प्यार की निष्ठा और दृढ़ता में कोई आशंका नहीं ।ऐसी मनोदशा में स्थिर प्रेम ही वह अहसास है जो लोक में घूमता – फिरता है लेकिन अपने प्रिय के प्रति अनुराग से भरा रहता है ।यह उस अनुराग भाव का ही परिणाम है जो प्रिया को उन्मुक्त भाव से बिना किसी संशय और शक के समाज में विचरण करने की विश्वास भरी छूट देता है ।बल्कि प्रिया अपने प्रेम की गहरी अनुभूति में डूब कर समाज के सुख – दुख के संदर्भों के बीच निर्भय होकर शरीक होती है । वहां बार – बार अपनी निष्ठा और समर्पण का प्रमाण नहीं देना पड़ता है ।सामाजिक मर्यादा का पालन करते हुए भी सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा बना जा सकता है ।समाज में कहीं भी विचरण करें ,आयें – जायें उससे प्रेम के प्रति किसी भी तरह की दृढ़ता में कमी नहीं आयेगी ।प्रेम वैचारिक होता है और उसकी बुनियाद विश्वास पर आधारित होती है ।प्रेम का अनुभव मनुष्य को करुणा ,दया , सहानुभूति, सहिष्णुता,सेवा ,त्याग ,संवेदना के भावों से परिचित कराता है । वर्तमान समय में यह प्रेम ,प्यार की भाव दशाएं बहुत चलताऊ और सतही हो चुकी है यह मान लिया जाता है कि यदि प्रिया ने किसी से बातचीत कर ली या किसी पराये व्यक्ति से हंस – बोल ली तो उसका प्यार खरा नहीं रहा ? उसमें विकार की खोट आ गई ? वह ओछी मानसिकता का प्रमाण है ।प्रिया भी एक सामाजिक मनुष्य है और उसका व्यवहारिक लोक भी वही है जो प्रिय का है ।इस तरह वे सभी लोक व्यवहार प्रिय और प्रिया दोनों के लिए समान ही है ।यह व्यवहार बिल्कुल ही त्याज्य होना चाहिए कि जब किसी से प्रेम हो गया ,प्यार हो गया तो वहां प्रिया का जीवन एक खोल ,एक आवरण,एकनिष्ठता के प्रमाण में बंध गया ? उसका हर लोक व्यवहार अग्नि परीक्षा की जरुरत बन जाये ।प्यार इतना सतही और चेतना हीन नहीं होता कि हर समय उसे अपनी निष्ठा और समर्पण के सबूत देने पड़े ।प्यार तो वह उन्मुक्त पवन है जो हर हमेशा पवित्र होती है ।वह प्रकाश है जो हमेशा उज्जवल होता है , वह सागर की गहराई है जो नीली लहरों की हलचल भरी तरंग है ।यह बंधन नहीं मन की उन्मुक्त अवस्था है ।जो हर बार बांट देने से बढ़ती जाती है ।जो प्रेम को और प्यार को नियंत्रित करने ,अपने वश में ,काबू में रखने के लिए प्रयास रत रहते हैं वह प्रेम नहीं वरन भोग या दैहिक प्रेम की अनुभूति से गुजरते हैं ।प्रेम ,प्यार तो मन और आत्मा को बंधन मुक्त कर देता है ।यह मनोविकार नहीं वरन मन के आनंद मय हो जाने की अवस्था है ।संसार का हर प्राणी इस प्रेम का हिस्सा बन जाता है ।यह प्यार को देखने का नजरिया है ।यह एक दृष्टि है जो प्यार को सर्वश्रेष्ठ और सर्वव्यापक बना देती है ।यह सीमातीत हो जाने का अहसास है ।जो संकीर्णता को उदारता में स्थापित करता है ।जो प्रिया के सीमित प्यार की अनुभूति को असीम प्यार में बदल देती है ।यह भय और संकुचन का अनुभव नहीं वरन निर्भय और चेतना का विस्तार है ।संवेदना के सर्वश्रेष्ठ को पा लेने का अंश है ।प्यार मुक्त करता है । जहां प्रेम को नियंत्रित किया जाता है वहां वह भाव नहीं वरन वस्तु रुप में ढल जाता है ।प्यार वस्तु नहीं जिसे सुरक्षित रखा जाये वरन वह तो वितरण की दशा है ।सबको बांटा जाये ।भोग एकांगी हो सकता है लेकिन प्यार की अनुभूति सर्वांगीण होती है ।वह दृष्टि ,वाणी ,स्पर्श , में समा जाता है ।मन निष्कपट और छल हीन हो जाता है ।यह है प्यार का अहसास ।प्रेम का उदय विचार का उदय होता है ।प्रेम अहिंसक बनाता है ।भोग हिंसा को उत्प्रेरित करता है ।विकार और विषाद पैदा करता है । प्यार और प्रेम मन को विषाद मुक्त करता है । सच्चा प्यार वामन को विराट रुप बनाता है ।विकार से निर्विकार बन जाना ही प्यार की दृढ़ता को पा लेना है ।
विनीता रघुवंशी
