Home आज की कविताप्रिया-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

प्रिया-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
प्रिया
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( ४ )
क्यारियों से कचरा उखाड़ती हटाती
तुम्हारी अंगुलियां पहले से ज्यादा
अच्छी लगने लगी हैं मुझे
ज्यादाह अच्छे लगने लगे हैं
चिड़ियों को
चूनी चुगाते तुम्हारे हाथ
पहले से ज्यादा
अच्छी लगने लगी है
तुम्हारी आंखें
कि जिनमें दुख – दर्द
पीड़ा को पहचानने की
दृष्टि आ गई है
मुखिया की नन्ही- मुन्नी को
चूमते तुम्हारे ओंठ
पहले से ज्यादा
मोहित करते हैं मुझे
पहले से खूब -खूब
अच्छे लगने लगे हैं
तुम्हारे चरण
जो तनिक – सी कराह पर
दौड़ पड़ते जरुरत मंदों तक ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
मनुष्य को मिले भौतिक शरीर का महत्व तब ही है जब वह संसार के अन्य मनुष्यों और प्राणियों का दुख दर्द समझे ।परहित जीवन व्यतीत करें ।स्वहित तो प्राणी मात्र अपने जीवन के मूल्य को जानता – समझता है । लेकिन जब वह समाज में रहकर अपने भौतिक अस्तित्व को अन्य प्राणियों की सेवा में अपना उपयोग करें ।कर्म ही जीवन है ।बिना कर्म के प्राणीमात्र अपने अस्तित्व को सर्वस्वीकृत नहीं बना सकता ।कर्म करना ही जीवन की वास्तविक सार्थकता है ।उस पर परहित कर्म रत रहना ही जीवन को सार्थक करना है ।प्रिया की कर्म शीलता ही मोहित करने की वजह बनी हुई है ।घर के आंगन में क्यारियों की सफाई हो या चिड़ियों को दाना – पानी करते हाथ हो या वह दृष्टि बोध हो जो संवेदनशील हो ।जिन आंखों में करुणा की नमी हो वह आंखें दृष्टि सम्पन्न हो गई ।पराया दुख और पीड़ा का बोध हो जाना ही तो संवेदना है ।प्रिया के ओंठ ज्यादा आकर्षित हो जायें जब वह मुखिया जैसी गरीब के बच्चे को वात्सल्य से परितृप्त कर दे । यहां यह दृष्टव्य है कि प्रिया का समग्र निजत्व केवल प्रिय की धरोहर या चित्ताकर्षण का सबब नहीं वरन प्रिया का सामाजिक स्वरुप ही प्रिय को लुभावना लग रहा है ।कर्म रत प्रिया ही प्रिय को मोहित कर रही है ।यह नव सौन्दर्य बोध है जो नयी कविता में स्त्री अस्मिता के नये आयाम को जोड़ती है। रीति काल में जिस तरह नायिका की नजाकत और रुप -श्रृंगार का चित्रण किया जाता था । वहां नायिका के नख से शिख तक के रुप वर्णन की परम्परा चली आ रही थी । लेकिन कविता में हमें यह नवीन भाव सौन्दर्य दिखाई देता है । जहां प्रिया के अंग – प्रत्यंग इसलिए मोहक और आकर्षक हो गये कि वे कर्मलीन हैं । आंखें इसलिए सुन्दर हो गई कि उनमें करुणा का भाव समा गया ।हाथ इसलिए हाथ हो गये कि उनमें प्राणी मात्र की क्षुधा शान्ति का माध्यम बन गये यही तो सौन्दर्य की नई परिभाषा है। जीवन की सार्थकता स्वार्थ सिध्दि और स्वहित तक ही सीमित होने में नहीं है ।वरन परकाज,परमार्थ, और परहित में ही है ।वहीं सौन्दर्य अधिकाधिक प्रिय है जो स्व से पर तक को स्पर्श करें ।कर्म में लीन प्रिया ही सर्व श्रेष्ठ सुन्दरी है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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