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प्रिया
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( ५ )
आओ ,एक दूसरे को हम
इतना बांध लें
कि आलिंगन में
कहीं भी सटक न सकें
हमारे सपने
हमारे संकल्प
जो समाज के बीच
इसी के खातिर संजोए हैं हमने ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
प्रिय का प्रिया ओ आलिंगन बध्द करना भी रचना में सोद्देश्य है ।आलिंगन इतना विचार और संकल्प से भरा है ।यह केवल भोग का पर्याय नहीं वरन कर्म का पर्याय है ।प्रेम की वास्तविक स्थिति वैचारिक है ।सृजन के लिए है ।समाज को बेहतर और वैचारिक पृष्ठ भूमि देने के लिए सपने बहुत जरुरी है और उन सपनों को अपने कर्म से समाज में व्याप्त करना भी बेहद जरुरी है ।बिना सपनों के यदि प्रेम को जिया जाता है तो वह थोथा प्रेम है ।वह चेतना शून्य प्रेम है ।वह म्यान और तलवारा सरीखा प्रेम है । इसलिए प्रेम की यह अवस्था सर्वव्यापक और सामाजिक है ।वह प्रेम निरा खोखला होता है जिसमें केवल व्यक्तिगत भोग की दशा हो ।वरन प्रेम का वह सामाजिक रुप ही स्वीकृत होना चाहिए जिसमें समाज के प्रति प्रगाढ़ विचार और दायित्व निर्वाह का संकल्प भी हो ।यह बंधन वैचारिक बंधन है जिसमें प्रिय और प्रिया समाज चेतना से एक दूसरे के निकट आयें हैं ।यह प्रेम की उच्चावस्था है ।यह। बंधन विचार ,चेतना , संवेदना,स्वप्न संकल्प के साथ बंधा है । इसलिए यह बंधन कमजोर नहीं बल्कि दृढ़ और दृष्टिबोध से संलग्न है । हर संकल्प और सपना समाज के लिए ही लिया गया है ।बिना विचार के किया गया प्रेम समाज के हित में नहीं होता । इसलिए प्रेम में विचार जरुर होना चाहिए । प्रेम समाज को दृढ़ता और चेतना प्रदान करता है ।प्रेम का मानवीय धरातल भी होता है ।इससे मनुष्य में करुणा, संवेदना ,ममत्व, और वैचारिक बोध जागता है ।प्रेम कभी भी समाज को कमजोर नहीं करता । इसलिए जब प्रेम के नाम पर आनर किलिंग ,इज्जत – बेइज्जती ,मान – अपमान की धारणाएं जोड़ कर प्रेम को हिंसा का जरिया बनाया जाता है तो यह अमानवीय मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है । समाज इस तरह के अत्याचार से कमजोर होता है । समाज की दृढ़ स्थिति प्रेम से ही पनपती है । इसलिए प्रेम एक सामाजिक विचार दशा है ।प्रेम ही अहिंसा की परिपक्व अवस्था है ।
विनीता रघुवंशी
