Home आज की कविताआंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

आंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आंगन
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( १ )
मुंह लटकाये
उसांसें ले रहा आंगन
हो न हो एक न एक तितली
झुलसी होगी
किसी न किसी कोने में ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आंगन घर का खुला हिस्सा होता है । जहां से घर की हर खबर ,हर दरयाफ्त ,हर जानकारी ,हर मेल- मिलाप ,हर हलचल का ,साफ – सफाई का सभी गतिविधियों और आने – जाने का हाल बयान करता है ।घर में हवा ,और रोशनी का जरिया भी होते हैं आंगन ।आंगन है तो बसाहट है यह हवाला भी आंगन ही अपनी खुशी और ग़म को व्यक्त कर देते हैं ।आंगन भवन निर्माण कला का बहुत ही अहम हिस्सा होता है ।घर – परिवार की हैसियत और सेहत का हाल भी इसी से मालूम हो जाते हैं ।आज वर्तमान समय में फ्लेट संस्कृति और बहुमंजिला इमारतों के चलन ने आंगन जैसे महत्वपूर्ण हिस्से को घर -द्वार से विलग कर दिया है ।आंगन में बैठे बूढ़े – बुजुर्ग और महिलाएं और बच्चों की चहक से गूंजता यह घर का सब हाल बता देता है ।खुली हवा और धूप का सीधा जरिया होता है ।यदि घर में आंगन है तो घर – परिवार की सेहत भी बेहतर है ।यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है ।आज की इमारत गिरी की कला ने यदि मनुष्य से कुछ छीना है तो वह जिन्दगी का खुला पन और रोशनी की चमक छीन ली है ।जिस घर में आंगन होता है वह समाज ,गांव ,शहर के आसपास के अन्य घरों से भी जुड़ा रहता है । वहां सब कुछ साझा होता है दुख भी सुख भी , वहां कुछ भी निजी नहीं होता । इसीलिए आंगन का मुंह लटकाना याने गांव या शहर के किसी घर में कोई अनहोनी होने का अनुमान ही लगाया जा सकता है ।यह मुंह लटकाना सामान्य बात नहीं है कोई असामान्य घटना के घटित होने का असर ही आंगन की चहल – पहल पर पड़ रहा है ।यह समाज के भीतर की अन्तर धारा के समान होता है । जहां समाज की हर घटना ,हर व्यथा ,हर पीड़ा ,हर चिन्ता , हर दुख अपना पूरा असर जरुर छोड़ता है । जहां हर व्यक्ति अपने संवाद को साझा कर सकता है। अपनी चिन्ता ,अपनी व्यथा ,अपनी पीड़ा को साझा करने का जरिया भी होता है आंगन ।आंगन में कुछ भी निजी नहीं होता ।आंगन की हर दिशा सबसे जुड़ी होती है । समाज में जिस भी घर में आंगन होता है वहां समाज की हर आपदा ,हर दुख ,हर पीड़ा आंगन की ही हो जाती है । वहां समस्या भी आती है और उनका समाधान भी वहीं निकल आता है ।जब से आंगन वाला हिस्सा घरों से विलग हुआ तब से घर – परिवार में अकेला पन और घरों की समस्याओं से जूझते अकेले मनुष्य तनाव और कुण्ठाओ से ज्यादा भर गये हैं । घरों के बीच की समीपता भी खतम हुई है । अब हर घर अपने आप के संघर्ष ,तनाव और चिन्ताओं से अकेले ही लड़ता दिखता है ।आंगन निकटता का जरिया होते हैं । बिना आंगन वाला घर चहकता नहीं वहां हर वक्त सन्नाटा पसरा रहता है ।इस सूनेपन से मुक्त करने का काम करता। है आंगन । इसलिए समाज में घटित हर घटना के असर को महसूस करता आंगन एक जीवन्त अहसास है ।समाज की अभिव्यक्ति का पता देता आंगन घर का ,भवन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है ।अपने घर – परिवार को अन्दर – बाहर से जोड़ता आंगन महत्वपूर्ण है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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