Home आज की कवितावह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

वह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
वह
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( ९ )
वह सदा से
अन्य पुरुष सर्वनाम ही रहा
मध्यम ने पीसा
उत्तम ने बरसाये कोड़े
अब उसे —–
भाव वाचक संज्ञा बनाया जा रहा
प्रत्ययों से लदा
एक व्याकरण आ रहा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत)
वृत्त में घिरे किसान के संताप दुख के संदर्भों को व्यक्त करती ये नौ कविताएं हमें उसकी सामाजिक अवस्था का यथार्थ बयान करती है ।किसान समाज की भूख के केन्द्र में हमेशा ही रहा है ।यदि किसान श्रम न करें तो विश्व के मानव समाज के सामने बहुत बड़ी विपदा खड़ी हो जायेगी ।इतने श्रम करते हुए भी किसान की हैसियत समाज में ,सत्ता के समक्ष नगण्य ही है ।समाज और राष्ट्र में – ” वह ” कहकर सम्बोधित किया जाता है । “वह ” कौन उसका परिचय क्या ? न महाजन उसे सम्मान देता है न सत्ता ही उसके श्रम का लोहा मानती है । वह हर जगह हर मुकाम पर केवल ” वह ” बनकर जाना – पहचाना जाता है । वह सर्जक है ।वह दाता है । वह सृष्टि का रखवाला है ।वह भूमिपुत्र है ।यह सब सम्बोधन कृषक के लिए है । लेकिन फिर भी उसका कोई लोक ,जगत, संसार में गरिमा जनित सम्मान नहीं है ।वह हर बार द्वार पर ही बैठाया जाता है । द्वार पर ही उसकी आव – भगत ,स्वागत आदि करके समाज दायित्व निवृत हो जाता है । वर्तमान समय में सत्ता ने उसे प्रतिपक्ष बनाए लिया ।मध्यम वर्ग के लोग उसका खूब शोषण करते हैं ।उच्च वर्ग उसे अपने समतुल्य नहीं समझता। ।यह समाज की सबसे बड़ी विडम्बना ही है ।सत्ता उसे अपना दास समझती है ।यह सब वैचारिक विकृति का ही रुप है ।जो किसान , जो कृषक ,जो श्रमजीवी ,खेतों को उर्वर बनाता है ।जो निरंतर धरती का आंचल हरा – भरा बनाता है ।विश्व की भूख का निवारण करता है उसका यह मान -सम्मान ? यह हैसियत ? यह रसूख ? यह विचारणीय तथ्य है ? जब वह सरकार के सामने अपनी बेहतरीन की उम्मीद लेकर खड़ा होता है तो उसे बन्दूक का सामना करना पड़ता है ।उसे शासन के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है और तो और उसे सामाजिक उपेक्षा और चुप्पी का भी सामना करना पड़ता है ।वह अपनी समस्याओं को खुद हल करता है ।समाज उसके संघर्ष में कहीं साथ खड़ा नहीं होता और न ही उसे अपनी सहानुभूति के काबिल ही समझता है ।”वह ” विचार विहीन समूह भर होकर रह जाता है ।वह सबकी चिन्ता में घुला जाता है किन्तु उसकी चिन्ता ,उसकी फिक्र में समाज बेचैन नहीं होता । जबकि समाज को अपने अन्नदाता किसान की बेहतरी के लिए सदा सर्वदा सजग और सचेत रहना चाहिए ।वह ही तो राष्ट्र की ,समाज की आर्थिक बेहतरी की बुनियाद है ।यदि राष्ट्र अपनी बुनियाद का महत्व आंकलन नहीं करता तो राष्ट्र का गर्त में जाना बिल्कुल तय है ।किसान के जीवन से जुड़े सभी मसलों ,समस्याओ, चिन्ताओ से समाज की शान्ति और चुप्पी पर असर पड़ना चाहिए ।समाज ही के भीतर से कृषक,और खेतीहर श्रमिक का निर्माण होता है ।समाज की जीवन धारा है किसान फिर भी समाज अपनी जीवन धारा से इतना बेखबर ? यह चिन्तित करने वाली बात है ।किसान है तो समाज का अस्तित्व है ।समाज की गरिमा है । राष्ट्र धन- धान्य से समृद्ध है । समाज खुशहाल हैं । ” वह ” अन्य नही वरन भारत के हर घर – परिवार में रचा – बसा उत्तम पुरुष है ।यही उसकी हैसियत होनी चाहिए । उसकी चिन्ताओ ,फिक्रों से समाज , राष्ट्र और परिवार को शामिल होना चाहिए ।वह केवल श्रमिक नहीं वरन राष्ट्र और समाज की प्राणधारा है ।जीवन रेखा है ।उसकी उपेक्षा ? समाज को अपनी वैचारिक चेतना में किसान को समाहित करना होगा । 🙏 विनीता रघुवंशी

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