14
वह
****
( ७ )
वह सोचता कि
जमीन का पट्टा तो उसे भी चाहिए
हवा के बिना फेफड़े
कहां से लेंगे ऊर्जा
अन्न के बिना कहां से मिटेगी भूख
तभी शक्की निगाहों से उसे
देखता बसंत
और बिना कुछ बोले
गांवों को रौंदता
चल देता शहर की ओर ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
वह एक आवृत विचार के बीच खड़ा श्रम जीवी किसान का प्रतीक बन कर उपस्थित हैं ।वह बार – बार विचारों के बीच लौट-लौट कर आता है ।उसके आसपास की स्थितियां कविता में एक हालात का माहौल रचती है ।किसान के आसपास चिन्ताएं हैं जो हर समय उसको मिटाना चाहता है अपनी मेहनत के दम पर लेकिन उसकी बहुत सी चिन्ताएं ,फिक्रे आर्थिक हैं तो कुछ सामाजिक हैं ,कुछ राजस्व और राजनीति से जुड़ी हैं ।इन सबका हल कर पाना भी उसकी फिक्र में शामिल हैं ।जमीन का स्थाई स्वामित्व भी उसे चाहिए ।यह काम गांव के मुखिया की मेहरबानी पर ही संभव है ।मुखिया अपने अहंकार में चूर है ।वह किसान के महत्व को सही नहीं आंकता ।किसान की जरुरत तो समाज को है ।राजनीतिक पद और ओहदेदारों को नहीं इसलिए ही मुखिया बसंत किसान की हैसियत और गांव को रौंदता निकल गया है ।आज की राजनीतिक सत्ता भी हथियारों से विश्व को नियंत्रित करना चाहती है और जनता भले भूख से तड़प रही हो उसके ख्याल में भी किसान की बेहतरी नहीं आती ।किसान भी समझता है कि उसे जमीन का स्वामित्व उसके लिए फेफड़े के समान प्राण रक्षक है बिना जमीन के उसका कोई वजूद नहीं ? जमीन ही तो उसकी खुद की आमदनी और समाज की भूख मिटाने का साधन है ।वह जमीन के सहारे ही संसार की भूख मिटाने वाला अन्न दाता है ।मुखिया की उपेक्षा का हिस्सा है किसान जबकि मुखिया को भी किसान की चिन्ता और फिक्र करना चाहिए।उसके जीवन संघर्ष और समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से करना चाहिए ।किसान ही वह वर्ग ,तबका ,वह ताकत है जो राज्य , राष्ट्र को उन्नत बनाए रखता है । राष्ट्र की पूरी अर्थव्यवस्था को अपने कंधों पर थामे रखता है ।जिस देश का किसान उपेक्षित है वह राष्ट्र भी गर्त में चला जाता है । राष्ट्र की वास्तविक शक्ति तो किसान में ही समाहित होती है । अन्न दाता कब तक अपनी जमीन पर ही श्रमिक की तरह बना रहेगा जो मेहनत कर रहा है वही तो असल मालिक है ।वह श्रमिक कैसे? किसान की इस अवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए ।खेती करने वाला कोई एक जाति ,धर्म या संप्रदाय का व्यक्ति नहीं होता ।खेती करना कृषि को व्यवसाय बनाना तो हर धर्म जाति के व्यक्ति का श्रम से जुड़ा हुआ है ।आज तक खेत में उगे अन्न के साथ किसी ने भेद भाव नहीं किया ।किसी ने धर्म की लकीरें नहीं खिंची ।सब अन्न वैष्णव माना गया ।धरती सब की माता मानी गई तो अन्न भी पवित्र हुआ । इसलिए श्रम हर हमेशा गरिमा का अंश बना रहा । इसीलिए किसान को भी जमीन का स्वामित्व मेहनत के आधार पर दिया जाना चाहिए ।किसी मुखिया की कृपा पर नहीं ।यह विचारणीय बात है ।राजस्व की। उगाही के आधार पर नहीं ।जमीन मेहनत कश की हो यह राज्य , राष्ट्र ,और समाज को सोचना – विचारना होगा ।
विनीता रघुवंशी
