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वह
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( ६ )
वह सोचता कि जब खेल रहे हों बच्चे
तब नहीं फोड़े जाने चाहिए बम
बच्चों की किलकारियां
सदा – सदा को कर देनी चाहिए निर्भय
वह सोचता और सोचते – सोचते
चल देता खेत पर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
किसान की जिन्दगी और आजिविका का ठोस धरातल विचार पर निर्भर है ।यदि किसान में विचार शीलता नहीं होती तो वह भी खुदगर्ज होकर अपनी मेहनत और श्रम को केवल अपनी निजी धरोहर ही मानता । लेकिन किसान श्रम शील भी है और विचार शील भी उसके विचारों में दुनिया भर की भूख शामिल हैं ।खेतों में उपजता अन्न का एक – एक दाना वह संसार को समर्पित कर देता है ।उपज पर उसका एकाधिकार नहीं है ।वह खेत से उठा कर बाजार तक पहुंचाता है लेकिन उस उपज को वह प्रकृति की देन मानता है ।यह भाव ही उसे सृष्टि के प्रति करुणा से भर देता है ।यह किसान की उदारता का प्रमाण ही है । इसीलिए उसकी चेतना और विचार सामाजिक और अन्नदाता के भाव से भरपूर है ।यह भी उसके विचार में समाहित है कि समाज को अपनी पीढ़ियों को संरक्षित करने के लिए शान्ति की जरुरत है इसीलिए तो वह सोचता है कि जब बच्चे खेल रहे हों तो बम नहीं फोड़े जाने चाहिए ।यह सब दुनिया भर में सत्ता का सुख भोग रहे राजनेता कहां विचार कर पाते हैं ।वे तो हथियारों के नये नये बाजार खोजते हैं और धमाकों के लिए इलाके तलाशते हैं । मनुष्य की मूल प्रकृति और स्वभाव तो अहिंसा का है लेकिन सत्ता के राज प्रमुख हथियारों की खरीद – फरोख्त में इतने मशगूल हो जाते हैं कि उन्हें विश्व के तमाम मनुष्य के जीवन की चिन्ता और फिक्र विस्मृत हो जाती है ।यह सब हम रुस और यूक्रेन ,हमास और इस्राइल , अफगानिस्तान और ईरान इराक के दुखद परिदृश्यों में महसूस कर सकते हैं जहां सबसे ज्यादा बचपन ही विकलांग ,और उजड़ा हुआ है ? बचपन को लेकर किसान ही विचलित और चिन्ताग्रस्त हो सकता है । किसान की चेतना में सृजन के विचार , निर्भयता , निडरता समाई होती है ।वह शान्ति और अहिंसा का हिमायती होता है ।बच्चों की किलकारियों पर भय का साया नहीं होना चाहिए ।यह बात समाज , राष्ट्र और विश्व को हमेशा हमेशा अपने चिन्तन में रखना चाहिए ।यदि बचपन भयभीत हैं तो फिर स्वस्थ समाज ,सजग समाज ,और निर्भय राष्ट्र की कल्पना भी अपूर्ण है ।जब राष्ट्र का बचपन भय ग्रस्त होगा तो समाज की वैचारिक सेहत भी निरोगी नहीं रहेगी । बचपन में भय का माहौल मनोवैज्ञानिक असर छोड़ता है । इसलिए समाज में राष्ट्र में शान्ति की जरुरत है ।भय चेतना को प्रभावित करता है ।कर्म जीवन में समाये भय को निर्मूल करता है ।आज वर्तमान में राजनीतिक सत्ता हर दम भय का इस्तेमाल करती हैं ।इससे बचपन में दंगा – फसाद ,अशान्ति और बम – बारुद से रचे जाते दृश्य बचपन को सहमा देते हैं । वह समाज में व्याप्त शान्ति , हिंसा से विचलित और चिन्ताग्रस्त सा भटकता है । मनुष्य को उन्नति के लिए स्थिरता की जरुरत होती है और कर्म रत रहने पर ही वह शान्त और स्थिर रह पाता है ।किसान सोचते हुए इसीलिए अपनी कर्मभूमि खेत पर चल देता है ।देश के हर नागरिक को अपने कर्म -चेतना को प्राथमिक रुप से अपनाना चाहिए ।कर्म ही वास्तविक धर्म है । मनुष्य की चेतना को सजग करने के लिए उसका कर्म ही दिशा है । कर्म भूमि ही धर्म भूमि है ।हिंसा नफरत ये कर्म रत व्यक्ति चेतना को भ्रमित करते हैं । आस्था के यथार्थ रुप को जानना और पाखंड को जीवन से अलग करना ही चेतना है ।
विनीता रघुवंशी
