Home कविता तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

वह **** ( १ ) दिन भर खेत – खलिहान में खुटते उसने सूरज को धमेड़ दिया मुंह लटकाये चला गया बापड़ा सांझ का उजास उस हट्टोट को लहलहाते खेतों …

मेरे देशजों ********* ( २ ) मैं तुम्हारे अंदर मातृशक्ति की मशाल थामे खड़ा हूं महसूस करो तुम्हें भी यह यक्ष उसकी उष्मा लग रही होगी इस मशाल को कहीं …

मेरे देशों ******* ( सुभाष संदर्भ ) ( १ ) मैं अनादि से ही तुम्हें रक्त के बदले आजादी देता आया हूं देशजों ! मैं वह अंगार हूं जो सदा …

सोचती है उदया ************** छोटी बुआ कितनी अच्छी लगती साड़ी में मानो दुनिया भर की साड़ियां बुआ के लिए ही बनी है यह सोचते ही तय करती नन्हीं उदया कि …

नर्मदा की भोर ************* लताओं के शबनमी स्पर्श से खड़े हो गये पेड़ों के एक – एक रोम और बगुले अपने परों को तौलते खींचने लगे श्वेत लकीरें जल पर …

कविता की खोज से बेखबर ************************ कविता की खोज में निकला ही था कि छींक दिया काली कुतिया ने भगाने के पहले वह ज़ख्म चाटती मच्छर मक्खियों से परेशान कूं …

घड़े बनाते कुम्हार के खयालो में *************************** घड़े बनाते कुम्हार के खयालों में उभरते तृप्त चेहरे चके पर साधी जा रही एक – एक गागर से छलक कर पल्लरें भरते …

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