आंगन ***** ( ३ ) कब टूटेंगी चिटकनियां ? कब खुलेंगी सांकलें ?? टकटकी लगाये घर को गोद में बिठाये बावला है आंगन ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
आंगन ****** ( १ ) मुंह लटकाये उसांसें ले रहा आंगन हो न हो एक न एक तितली झुलसी होगी किसी न किसी कोने में । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी …
प्रिया ***** ( ५ ) आओ ,एक दूसरे को हम इतना बांध लें कि आलिंगन में कहीं भी सटक न सकें हमारे सपने हमारे संकल्प जो समाज के बीच इसी …
प्रिया **** ( ४ ) क्यारियों से कचरा उखाड़ती हटाती तुम्हारी अंगुलियां पहले से ज्यादा अच्छी लगने लगी हैं मुझे ज्यादाह अच्छे लगने लगे हैं चिड़ियों को चूनी चुगाते तुम्हारे …
प्रिया ***** ( ३ ) आजकल तुम सभी से हंसती – बतियाती हो सभी के सुख – दुख में होती हो शरीक प्यार की वो—- व्यक्तिगत लीक कितनी फूहड़ है …
प्रिया ***** ( २ ) यूं तो तुम नाज़नीन रही हो हमेशा से लेकिन खतरों के बीच इतनी जल्दी फन उठाए कर फुत्कारती नागिन बन जाना एक ऐसी मुद्रा है …
प्रस्तुत ******** ( २ ) धूप के माथे उठा कर धुएं की शिकने अब न जायेगी कहीं भी रोशनी बिकने अब न अन्ना बटेरों को खायेगा अब न बौनापन शिखर …
प्रिया ***** ( १ ) मैं रोज – रोज देखता हूं आदमी की मौत रोज – रोज देखता हूं आदमी की लाश पर पैदा होती भीड़ ये भीड़ सिर हिला …
