Home आज की कविताआंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

आंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आंगन
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( ३ )
कब टूटेंगी चिटकनियां ?
कब खुलेंगी सांकलें ??
टकटकी लगाये घर को
गोद में बिठाये
बावला है आंगन
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आंगन अपने बंधन को तोड़ना चाहता है ।हमेशा बंधन तभी टूटते हैं जब भरोसे की जड़ें बहुत गहरी हो जाती हैं ।आंगन बहुत संवेदनशील है वह पूरे घर की सुरक्षा में हर वक्त सन्नध्द रहता है ।अपने घर – परिवार को हमेशा ओट में रखता है हर कोई उसमें प्रवेश नहीं कर सकता । इसलिए कहा है घर को गोद में बिठाये आंगन व्याकुल है खुलेपन के लिए याने बधन हीन आवाजाही ।गली – मोहल्ले के ,अड़ोस – पड़ोस की निर्बाध आवाजाही ।सबसे बहन,भाई,नन्द,भोजाई का मिठास वाला रिश्ता नाता बनाने को आतुर आंगन ।आंगन ही वह सहज आत्मीयता को महसूस करता है जहां से रिश्तों के भरोसे बरसों बरस बनते और अनजान अजनबी लोगों को अटूट बंधन में बांधें रखते हैं। इतने गहरे नजदीकी रिश्ते और संबंध कि पीढ़ियां गुजर जाती है लेकिन बंधन नहीं टूटता हर समय हर स्थिति में उसे निभाया जाता है । इसीलिए आंगन घर को अपनी गोद में बिठाना चाहता है ।घर की हलचल से आस – पड़ोस को जोड़ना चाहता है ।आंगन के गेट पर लगी चिटकनियां और सांकलें ही तो आंगन की सहजता में रुकावट है । आंगन तो हर हमेशा घर को खुलापन देना चाहता है किन्तु अवरोध तो सांवले पैदा कर रही हैं ।यदि समाज में संबंधों के बीच भरोसा और विश्वास दृढ़ता से बना रहे ,आत्मीयता की नींव मजबूती से अपनी पकड़ बनाये रखे तो फिर आंगन में से सांवले और चिटकनियां खुद ब खुद गायब हो जायेंगी ।ये तो आदमी की बेभरोसाई की निशानियां हैं ।जब तक समाज में मानवीयता पर भरोसा और प्रेम का अहसास नहीं होगा तब तक आंगन में सहज आवागमन की स्थितियां भी नहीं बन पायेगी ।आदमी के भीतर के छल – छंद ,धोखे, बेईमानी , विश्वास घात के विकार पनपते और बनते रहेंगे तब तक आंगन के दरवाजों पर सांकलो का ,चिटकनियों का पहरा लगा रहेगा ।आदमी को सबसे पहले प्रेम ,भरोसा ,लगाव ,आत्मीयता के मनोभाव अपने भीतर फैलाने होंगे ।तब उसके भीतर बसे मनोविकार बेईमानी ,छल -कपट, धोखा ,विश्वास घात ,चोरी , उच्छृंखल स्वभाव सब नदारत होंगे तब आंगन का संबंध उदार सहजता से स्वत: जुड़ जायेगा ।तब आंगन में घर – परिवार ,बहू बेटियां उन्मुक्त सांस – प्रश्वास ले सकेंगी ।घर का हर परिजन आंगन में सुरक्षित रहेगा । बच्चे – बूढ़े , स्त्रियां सब मुक्त भाव से भरोसे की सांस ले सकेंगी आंगन में बैठकर ।आंगन है तो निगरानी है गली – मोहल्ले में होती हर बेजा – जा -बेजा हरकतों और हलचलों पर । आंगन ही तो सहज आत्मीयता के वे खुले दरवाजे हैं जहां से फेरीवाला , फुटकर बिक्री करते व्यापारी को अपना व्यवसाय तक ग्राहक खोजने का सुभीता और सुविधा है । आंगन है तो सब है ।हंसी मजाक है ,हंसी ठिठोली है ।।
🙏 विनीता रघुवंशी

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