Home आज की कवितावह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

वह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
वह
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( ४ )
चिलम का कंकर साफ करते हुए वह
देखता है भर दुपहरिया में
आट्या – पाट्या खेलते बच्चे
कि जिनका संसार
चिड़ियों की चहक जैसा
तोड़ रहा सन्नाटे
बुलाता मेड़ पड़ोसी को
चिलम पीने के बहाने
और आलस को झटक
चल देता काम पर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
वह किसान है और दिन रात खेत को तैयार करने में जुटा है ।गर्मी की दोपहर है ।बच्चे खेल रहे हैं ।किसान खेत में काम करते करते थक गया है ।गर्मी की दोपहर में स्वभावत: नींद या उनिंदापन ,झपकी आ जाना स्वाभाविक ही है ।इसी वजह से किसान भी अपने आलस्य को दूर करने के लिए मेड़ पड़ोसी को चिलम के बहाने बुलाया है ।आपसी बातचीत और चिलम का कश आलस्य को दूर कर देते हैं ।सिर पर आषाढ़ की तैयारी की चिन्ता है ।फसल की बुआई – बिजाई की सार – संभाल करना है और देह में आलस्य ,थकान की शिथिलता ।बच्चे चिड़ियों से चहक रहे हैं उनकी मौज -मस्ती देखकर मन में जोश भर रहा है ।तन में भरे आलस्य को हटाने का तरीका है मेड़ पड़ोसी से बात ,संवाद करना और इस तरह चुटकी में थकान मिट जाती और फिर फुर्ती से काम शुरू ।यह सब किसान ही कर सकता है क्योंकि यदि वह आराम करने लगेगा तो वह समय चूक जायेगा ।बरसात आ कर खेतों को पानी से भर देगी इसीलिए अभी आलस्य नहीं वरन फुर्ती और स्फूर्ति की जरुरत है ।फसल की बुआई की फिक्र है ।समय पर काम निपटाने की चिन्ता है ।किसान का पल भर रुकना भी हराम है ।अहर्निश श्रम ,दिन-रात काम में डूबा मन ।किसान इसी कारण दाता है ।हर वक्त संसार की चिन्ता ।उसकी भूख की फिक्र ।जिस तरह बच्चे सन्नाटे को अपने खेल से तोड़ते हैं वैसे ही किसान भी धूप में तपता खेत खेत जुताई करता संसार में पसरे सन्नाटे को तोड़ता है ।वह धरती की आवाज और चेतना है ।वह ऐसी स्वर लहरी है जिसके तरंगित होते ही दुनिया झूम उठती है ।फसल न हो तो दुनिया भर के चेहरे उदासी – मायूसी से मुरझा जायेंगे ।यदि किसान समय पर खेत में बखरनी – बोनी न करें तो खेतों में सन्नाटा पसर जायेगा । किसान है तो संसार में चहक है । हर पेट के लिए अन्न है और वह अन्न दाता है ।उसका सोना ,उसका आलस्य ,उसकी थकान में सारा संसार मूर्छित हो जायेगा ।किसान चैतन्य रहे तब ही संसार भर की भलाई है ।किसान का आलस्य में डूबना माने संसार का डूब जाना है । गर्मी की भर दुपहर आलस्य की दुपहर लेकिन किसान के लिए आलस्य को अपने ऊपर हावी होने देना मतलब समय से चूक जाना है । इसीलिए वह दायित्व की चेतना में डूबा है । यदि संसार का हर व्यक्ति अपने दायित्व निर्वाह में इसी तरह मुस्तैद रहे तो सांसारिक चेतना में कर्मशीलता से आता बदलाव असंभव नहीं है । किसान की श्रमशीलता समग्र संसार के लिए है । दुनिया के हर कोने में सदा ही श्रम की जय हुई है । जहां जहां किसान है वहां वहां की भूमि सदा श्रम से विजित होती रही है ।खेतों में फसल नहीं किसान का श्रम लहलहाता है । फसलों पर सुनहरी चमक की आभा भी किसान के श्रम का ही प्रमाण होता है ।किसान दाता है और दाता हमेशा पाने वाले से बड़ा होता है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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