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वह
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( ३ )
दिन भर अच्छा लगा
हजार – हजार हाथों से
दिल खोल कर
रोशनी जो बांटी सूरज ने
बहुत बुरा लगा उसे
गांव के मंदिर का पुजारी
जो घण्टों भजन गम्मत के बाद
बांट रहा चुटकी भर परसाद ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता में दो दृश्य उभारे गये हैं एक दृश्य उदारता और दूसरा दृश्य संकीर्णता का ।
सूरज अपनी हजारों किरणों से रोशनी ,उष्मा ,धूप ,ऊर्जा का संचरण पूरी पृथ्वी पर खुले दिल से पसार रहा है ।यह प्रकृति की उदारता का प्रमाण है । मनुष्य प्रकृति से खूब प्राप्त करता है लेकिन जब बांटने का समय आता है तो अपनी कंजूसी ,अपनी संकीर्ण वृत्ति ,अपनी अनुदारता में सबको पीछे छोड़ देता है । मनुष्य और प्रकृति दोनों समानांतर है ।दोनों का स्वभाव एक समान है लेकिन मनुष्य अपनी अनुदारता का प्रमाण अपने दाता रुप में दिखला देता है ।जब वह देने वाला बनता है तो। चुटकी का उपयोग करता है और लेना वह खूब सारा चाहता है ।यह स्वभाव भिन्नता ही मनुष्य के जीवन को प्रश्न वाचक बना देती है ? पृथ्वी पर फैली सूरज की दाता वाली छवि हर बार बहुत अच्छी लगती है लेकिन मंदिर का पुजारी जो प्रतिनिधि है ईश्वर का उसकी अनुदारता बुरी लगती है ।यही विचारणीय है ? समाज में आदमी अपनी भूमिका का चयन सही नहीं करता ? जब उसे शिक्षा ,स्वास्थ्य, अनुभव, साधना ,धारणा ,भक्ति ,आस्था , सेवा त्याग ,करुणा ,सहयोग विचार सब कुछ समाज से ही मिलता है तब परसाद का वितरण इतना कम क्यों ।ईश्वर अपनी कृपा में उदार है ,प्रकृति अपनी चेतना में उदार है तो मनुष्य क्यों अनुदार है ।उसे भी अपने आप पर भरोसा करना चाहिए ।हमेशा उदार होना सभी प्राणियों को अच्छा लगता है फिर मंदिर का पुजारी क्यों अनुदार है ? सवाल यहां उठता है ? पुजारी की अनुदारता बुरी है ।संस्कार हीन है ।आज वर्तमान में मंदिरों का जिस तरह इस्तेमाल हो रहा है वह चिन्तनीय है ।आज पूजागृहों में आस्था और संस्कार विलुप्त हो चुके हैं वहां केवल दर्शन भर रह गये हैं ।उनमें न तो संस्कार देने की क्षमता बची है न वे संस्कार के केन्द्र ही बचे हैं । वहां आस्था सिर्फ झांकी के श्रृंगार भर में बची है न तो वे शिक्षा के केन्द्र रहे न वे आस्था के केन्द्र रहे , नवें उदारता की मिसाल ही रहे न वे सामाजिक सौहार्द्र के जरिए रहे ।आज समाज में जो वैमनस्य फैलाया जा रहा है वह मंदिर – मस्जिद के जरिए ज्यादा उकसाया जा रहा है ।मंदिर आज भय के स्रोत बन गये हैं । मंदिरों के बहाने जो नफरत ,घृणा और चेतना का भोजन किया जा रहा है उस पर सच्ची श्रध्दा और आस्था का जरिया बने मंदिर ।मंदिर आज बाजार में बदल दिये गये हैं इस पर गहराई से समाज को विचार करना होगा ।तब ही वहां उदारता भरी आस्था और श्रध्दा भरा ज्ञान प्रतिष्ठित होगा । वर्तमान में मंदिर ज्ञान भरे विवेक की भूमिका से , आस्था मय भक्ति के सौन्दर्य से ,और श्रध्दा मय वैचारिक चेतना से विलग हो चुके हैं ।यह मन को खिन्न करने वाली अवस्था है ।यह दशा समाज के पतन का प्रमाण है । समाज को भक्ति ,ज्ञान, और कर्म की पुनर्स्थापना तो करना ही होगी ।मंदिर मठ आस्था ,भक्ति के पर्याय बने और हिंसा के विचार से मुक्त हों ।यह चुटकी भर अनुदारता का भी त्याग करें ।यह पुजारी की भी भूमिका का बेहतर बदलाव होगा ।
विनीता रघुवंशी
