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यह वही पेड़ है
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यह वही पेड़ है
जिसे तुम पहचानने से
इन्कार करते हो !
जब पहली बार —यह पेड़
तुम्हें दिखाया था — इस पर
चिड़ियां चहक रही थी और
थके यात्रियों से छेड़-छाड़ करती हुई
गिलहरियां टहक रही थीं
अब इस पर
गिध्दो का बसेरा हो गया है
जिनकी बीट से
इसके पत्ते और डालियां
कोढ़ियो जैसे लगने लगे हैं
किसकी गलती है यह ?
इस पेड़ की या हवा की
या इसके आस पास पसरे
आदमी नुमा मौसम की ?
आखिरकार किसकी ??
गौर से देखो –उसे वक्त भी
इसके उत्तर में
काफी दूर से दिखाई देता
वो धवल पहाड़ और पवित्र नदियां
जो पेड़ को ऊंचा और हरा-भरा बनाये रखती थीं
अब भी साफ -साफ नज़र आ रही हैं
उधर कान लगाओ
दक्षिण की तरफ
वहां से भी समुद्र की ललकारें
साफ -साफ सुनाई दे रही हैं
इसी भूगोल की गवाही के बीच
तुम्हें यह पूड़ी दिखाया था
ध्यान से देखो
पेड़ अब भी कसमसा रहा है
नये भविष्य के लिए
काफी कुछ सोच रहा है इन दिनों
क्या तुम
उसके साथ हो सकते हो ??
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
यह वही पेड़ है ।जी हां यह वही पेड़ है देश रुपी पेड़ ! पेड़ यहां देश के प्रतीक में है ।आजादी के संघर्ष और विभाजन की साम्प्रदायिकता के घनघोर अंधकार में ब्रिटिश सत्ता के बोये बीज को फलते – फूलते और सामुदायिक नफरत को बढ़ाते हुए हम इतने ग़ाफ़िल हो गये ,इतने मदहोश हो गये ,हम इतने बेहोश हो गये कि हमारी राष्ट्रीय चेतना का बोध ही गुम हो गया ? आज देश की एकता के अर्थ हमारे आस – पास भी नहीं है ।हम धर्म और उन्मत्त राष्ट्रवाद के व्यूह में फंसे अपने देश का प्रेम भूल गये ? यह वही पेड़ है जिसके उत्तर में धवल हिमालय , और गंगा, चिनाब ,झेलम, सतलुज जैसी नदिया है और दक्षिण में हिन्द महासागर की हरहराती लहरें हैं। इस पेड़ का भूगोल हम से अपरिचित और और अनजाना नहीं हैं ।हमने इसी पेड़ की आजादी के लिए अहिंसक तरीके से संघर्ष किया और आज हम इसकी चहक को भूल कर इसे ही अपने अनैतिक आचरण ,अपने नफरत भरे वक्तव्यों से आहत कर रहे हैं ।अपने ही देश के अनुशासन को ,नियम – कायदों को, स्वराज्य को अराजकता में , उच्छृंखलता में , निर्लज्जता में , मूल्य हीनता में , बदल कर गर्व महसूस कर रहे हैं ।क्या हम हमारी संसदीय व्यवस्थाओं को और विधानसभा के बिकाऊ हो जाने ,हमारे जन प्रतिनिधियों के बेशर्मी से बिक जाने और किसी एक राजनीतिक दल को ही राष्ट्र मान लेने जैसी पतित चलन को स्वीकार कर लेना भी तो हम सब की भूल और भ्रम ही है ।सचमुच यह तो विचारणीय ही है कि यह राष्ट्रीय चेतना का खो जाना किसकी गलती है ।हम सब देशवासियों की ? यह सवाल तो हर देशवासी से पूछा ही जाना चाहिए ।आज हमने अपने ही निजाम से बेवफाई की है ।आज हमने अपने स्वदेश से धोखा किया है ? आज हमारे देश प्रेम के प्रमाण भ्रष्टाचार में खो गये ? हम खुद ही खुद के देश को लूट रहें हैं , दंगों की आग में झौंक रहे हैं , बस्तियां उजाड़ रहे हैं , हमारे समाज की स्त्रियां,बच्चे, बुजुर्ग ,बेघर भटक रहे हैं और हमारी चुनी हुई सरकार सत्ता का सुख भोगने में मगन है । सत्ता गिध्द बनी देश को गंदगी से ,लालसा से ,प्रलोभन से ,स्वार्थ से लालच से ,नफरत से ,फसाद की बीट से गंदा कर रही है ।हम चुपचाप यह सब होते हुए देख रहे हैं क्योंकि हमारी राष्ट्रीय चेतना का अहसास कहीं छोटे – छोटे स्वार्थों में दब गया है ? आज हमारी राष्ट्रीय चेतना जाति ,समुदाय, अल्प संख्यक, पिछड़ा ,हरिजन, आदिवासी में वोट की राजनीति में बांट दी गयी है ।यह सब हमने चुनाव – चुनाव के खेल की राजनीति से रच डाला है । हमें फिर से अपना राष्ट्रीय चरित्र गढ़ना होगा ।हम में एक राष्ट्रीय धारणा का उदय करना होगा ।वरना हम खंड – खंड में टूट कर बिखर जायेंगे ।क्या यही हमारे वटवृक्ष रुपी पेड़ की अंतिम परिणिति होगी ? देश का वास्तविक रुप तो अखंड भारत का ही होना चाहिए । राष्ट्र चेतना इतनी परिपक्व और दृढ़ होना चाहिए कि जिस पर जाति ,धर्म ,क्षेत्र,के संकुचित काले साये कभी न पड़े । राष्ट्र धर्म सर्वोपरि धर्म है । हमें अपने देश को पहचानना होगा ।देश की फिक्र करनी होगी ।देशकी चिन्ता में डूबना होगा । देश का पुनर्निर्माण करना होगा ।देश आज भी राष्ट्रीय बोध के लिए छटपटा रहा है ।वह बदतर के बीच कसमसा रहा है उसे नव जवान पीढ़ियों से उम्मीद है कि वे देश प्रेम की , राष्ट्र भक्ति की नई मिसालें रचेंगे । देश के बदतर हालात बदलने को तत्पर होंगे। देश नये भविष्य को रचना चाहता है और हमें उसके साथ दृढ़ता से खड़ा होना ही है ।यही तो अपने देश के प्रति समर्पण है । यही तो देश राग है ।यही तो देश को आत्मस्थ कर लेना है ।आज हमारे देश की संस्कृति को हमने उदरस्थ कर लिया है ,देश उदरस्थ करने की वस्तु नहीं अपितु देश को तो हृदयस्थ करना चाहिए ।हमारे दिल – दिमाग में वह स्पन्दन की तरह धड़कता रहे ।हमारा हर काम ,हर आचरण,हर मर्यादा देश की गरिमा बढ़ाने वाली हो । यही है देश के साथ खड़े होने का भाव ।देश के साथ चेतना का सामंजस्य और राष्ट्रीय चेतना का बोध ।सत्ता को ,शासन – प्रशासन को ,जन प्रतिनिधियों को अपने आचरण की गिरावट से पहले देश की धड़कन को आत्म सात करना होगा । सही मायने में यही देश रुपी पेड़ से ,उसकी जड़ों से असल पहचान है । पेड़ के बहाने राष्ट्रीय गौरव की स्मृतियों में जाग जाना भी एक बेहतर अवस्था है । देश की गरिमा को प्रतिष्ठित करना ही राष्ट्रीय संवेदना है । आज पत्रकारिता, संवैधानिक संस्थाएं ,जन प्रतिनिधि ,संसद और विधायक अपने चारित्रिक गिरावट से जो शर्मनाक स्थितियां बन रही हैं उससे तो यही लगता है कि वे देश की गौरव पूर्ण महिमा को पूरी तरह भूल चुके हैं ? टुच्चे स्वार्थों में उलझे देश की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं ।
विनीता रघुवंशी
