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मां से पकौड़िया खाते हुए
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मां भजिए बना रही है
आज कई दिनों बाद खा रहा हूं
देख मां ! यह भजिया कछुए जैसा
यह गरुड़ सरीखा
यह तो शेर का बच्चा लगता है मां !!
इसे तो देख
यह तो देख झपट्टा मारता बाज है !
यह भाले की शक्ल के समान
ओह हो ! यह तो हथगोला है मां !
मां, तू कितनी – कितनी आकृतियां बनाई देती है?
अब मैं थाली में बची
आखिरी पकौड़ी उठाते ही चौंक जाता हूं
और चीखता हूं पूरी ताकत के साथ
मां ! यह पकौड़ी तुम्हारी तरह क्यों है ( नरम और ठण्डी )
मां ?
पर कोई जवाब नहीं मिलता — कहीं से भी
मां ! मां – – – !! बता तो ??
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह। —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज की कविता वैचारिक गंभीरता के संकेत लिए है । मां ही है जो विश्व की , ब्रह्माण्ड की चौरासी लाख योनियों की आकृतियों का सृजन करती है ।हर प्राणी और जीव मां की कोख से ही जन्म लेता है ।विश्व के किसी भी प्राणी का जीव मात्र का सृष्टि में जन्म मां के गर्भ धारण का ही प्रतिफल है ।मां ही आकृतियां रचती है ।यह बहुत गहरी वैज्ञानिक अवधारणा है जो बिना मां के सृजन संभव नहीं बनाती । मां ही होती है जो कछुए को जन्म देती है, गरुड़ सरीखा बनाती है ,मां ही होती है ,शेर का बच्चा जनती है , झपट्टा मारता बाज भी मां से ही जनम लेता है , भाले भी मां ही रचती है ।यह सब आकृतियां मां की ही देन है ।कविता का मर्म जहां आकर सिमट जाता वह है मां के स्वभाव का नरम और ठण्डा हो जाना ? वह आक्रोश ,गुस्सा ,क्रोध सब पर संयम रखती है और केवल अपनी संतान का संरक्षण करती है ,पालन – पोषण करती है ।उसके जीवन को सुरक्षित और प्रभावी रचनात्मकता से जोड़ती है । मनुष्य अपनी जननी के बोध से अनभिज्ञ नहीं रहता है किन्तु पशु – पक्षी और जीव मात्र की भी मां होती है ।ममता एक वैश्विक अहसास और अनुभूति है । भले पशु – पक्षी अपनी अभिव्यक्ति में मूक और मौन होते हैं लेकिन वे बोध और संवेदना के स्तर पर हम मनुष्यों से ज्यादा बेहतर महसूस अनुभूतियों से जुड़े रहते हैं । मनुष्य अपनी संवेदना और अनुभव , अनुभूति को कृत्रिम बना सकता है लेकिन पशु – पक्षी और जीव मात्र अपनी स्वाभाविक प्रकृति को नहीं छोड़ते ।उनके जीवन का सहज – सरल सच मनुष्य के जीवन बोध से ज्यादा प्रकृति ,और पर्यावरण के नजदीक होता है । प्रकृति से वे जीना सीखते हैं । मनुष्य अपने जीवन काल को समाज ,परिजन ,परिवेश , अवधारणाओं , शिक्षण ,प्रशिक्षण ज्ञान जीवन दृष्टि से समृध्द करता है । मां! सामाजिक परिवेश के बीच मनुष्य का लालन – पालन करती है और समर्पित होते होते वह मानवीय चेतना से इतनी दूर हो जाती है कि उसे सही और ग़लत का आत्म ज्ञान भी असर नहीं करता ।कविता में “मां ” की इसी आत्म-विस्मृत अवस्था को महसूस करते हुए चीख निकलती है ? यह चीख उस चेतना विस्मृत मां के लिए है जो मनुष्य होने की चेतना को भी महसूस करना छोड़ चुकी है ।मां का मनुष्य होना भी चेतना का लौटाना है ।मां है तो वह पहले मनुष्य है ।उसकी भी एक सामाजिक स्थिति है ,उसका भी आत्म सम्मान है ,उसकी भी दैहिक , भौतिक भावनात्मक,और मानसिक – जरुरतें हैं । जब मां को नजदीक से महसूस किया जाता है तब ही मां का नरम और ठण्डा होना अनुभूति होता है ।यह नरम क्या है ? उसकी बेचारगी ? लाचारी या खुद की खुद उपेक्षा करना ? अपने शौक ,अपनी रुचियों को भूल जाना ? अपने आपको महसूस करना छोड़ देना , अपनी शिक्षा ,अपने खेल,अपने कौतूक,अपनी उमंग ,उत्साह , अपने मन को अनुभूत करना , अपनी सहज चंचलता , अपने बचपने को भूल जाना ही वह नरम हो जाना है ।यह नरम या भावना का विस्मरण है ? अपनी मानवीय अवस्था को महसूस करना छोड़ देना है ।केवल सामाजिक दायरों में बंध कर अपने आपको शून्य कर देना है ? यह ठण्डा हो जाना भी एक ख़तरनाक सवाल खड़ा करता है ? मां ! एक चेतना से दूसरी चेतना में रुपान्तरित की दशा है ।स्त्री का ममत्व संतान में रुपान्तरित होता है । “स्त्री “वह मां बनती है और अपने तदरुप को संतान में हू- ब- हू वैसा ही रचती है और इस सिलसिले में वह अपने अस्तित्व को पूरी तरह खो देती है ।यह” खो ” देना ही तो है शून्य बनकर जीना । अपनी उपेक्षा करना ? अपनी अभिरूचियो और अपनी अस्मिता को भी शून्य कर देना ? यह ठण्डा पन ही तो मां के अस्तित्व को बचाने के लिए चीख का निकलना है ? हम और हमारा समाज – ” मां ” की चेतना और संवेदना के प्रति इतने निरपेक्ष हो चुके हैं कि अब हमारे लिए “मां ” शब्द भी निर्वाक हो चुका है ? मां अब दैहिक हो चुका है आत्मिक नहीं ? यह” मां ” का जननी रुप नहीं भौतिक रुप ही है ।जो भौतिक संसार में विलीन हो चुका है ? मां अब समाज ,संसार ,वैश्विक जगत , ब्रह्माण्ड ,सृष्टि, सृजन की चेतना के तदर्थ रुप में नहीं रह गयी।वह समाज की करुणा , संवेदना ,यथार्थ से अलग – थलग केवल भौतिक अस्तित्व भर रह गई है ।अब वैश्विक चेतना से लेकर मानवीय चेतना तक में ” मां ” का दैविक, और आत्मिक रुप खो गया है ? मां हाड़ मांस का भौतिक शरीर भर महसूस होती है ।उसका आध्यात्मिक अस्तित्व भी कहीं न तो अनुभूत होता है न ही वह चेतना ,करुणा ,या संवेदना में ही महसूस होती है ? मां के सामाजिक अस्तित्व के प्रति घनघोर उपेक्षा ही चीख का कारण है ? यह चीख हिला देना चाहती है समाज की चेतना को जागृत करना चाहती है स्त्री अस्मिता के अस्तित्व को ,यह साधारण और सामान्य चीख नहीं है ? यह चीख मानव मात्र के अस्तित्व को बचाने के लिए है ।यदि मां ही ठण्डी और नरम हो जायेगी तो सभी संततियो का संसार में आना असंभव हो जायेगा ? यह विचारणीय प्रश्न है ? संसार की निरंतरता के लिए मां का उष्मा और चेतन रहना बहुत बहुत जरुरी है! ” मां ” शब्द ही नहीं मां का ऊर्जा वान बना रहना ।अपने आपके अस्तित्व को चेतन बनाये रखना भी बेहद जरुरी है । आत्मविस्मृत होना मृत्यु है और आत्म सजगता जीवन का ताप है । मां की सादगी, त्याग ,समर्पण सब चेतना से जुड़ा होना बेहतर है ।स्त्री मां होने से पहले मनुष्य है ।अपनी मानवीय अहसास को महसूस करते रहना ही आत्म सजगता है ।
विनीता रघुवंशी
