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ठण्डी चट्टान के नीचे
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एक घूंट
यह एक घूंट पानी
मैंने क्यों पिया ? क्यों ? ?
सारे दांत ठनक उठे हैं !
गला, जो सदियों से दबोचा जा रहा है
लम्बे नाखूनों वाले पंजों से — लहुलुहान है
कैसे गुटकूं ??
हां , गुटके लेता हूं यह पानी
आंखें बन्द करके पूरी ताकत के साथ
अन्न नलिका में गोल – गोल घूमता हुआ यह
अमान्य तक पहुंच रहा है
सौ – सौ चाकू चलने लगे हैं पेट में
मैं इस पानी को बर्दाश्त नहीं कर सकूंगा
और न ठिठुराती ठनक को
बिना किसी कवच कुण्डल के
यहां ,एक आग है ; मेरी मुट्ठी में
पानी की इस ठण्डी चट्टान के नीचे
ज्वालामुखी होती हुईं — भीतर और भीतर – – – हां !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
मनुष्य हमेशा से ही अपनी इच्छाओं की प्यास और तृप्ति के लिए पानी का , आंकाक्षाओं का , कामनाओं का , कर्म का उद्योग और उद्यम करता रहा है । मनुष्य के जीवन की समस्त क्रिया शीलता के पीछे ,कर्म के पीछे उसकी कोई न कोई इच्छा पूर्ति का साधन और साधना होती है ।वह निरंतर अभ्यास करता है ,वह निरंतर शिक्षा ,सेहत ,दौलत, सम्पति , सब जोड़ता रहता है ।यह इच्छाओं की परितृप्ति ही उसे जीवन में कर्म के लिए प्रेरित करती है ।यह कर्म ही प्यास है ,यश की ,आमदनी की ,कीर्ति ,नाम , सम्पत्ति , धन , विरासत ,धरोहर ,सब के निशान छोड़ने की अभीप्सा ही तो प्यास है ।इस प्यास का शमन करने के लिए ही आदमी पहला घूंट जैसे ही गुटका है वैसे ही वह इच्छाओं के अनवरत बंधन में जकड़ता जाता है ।वह इच्छाओं का दास बनता जाता है ।यह पहला घूंट ही तो अतृप्ति है ।यही तो विचारणीय है ? पहला घूंट क्यों पिया ? जीवन चक्र की गति में ही तो इस पहले घूंट की अहमियत है ! जैसे ही मनुष्य संसार के सृजन क्रम में शामिल होता है वैसे ही वह अनजानी इच्छाओं ,अतृप्त कामनाओं के अनदेखे मकड़ जाल में उलझता जाता है ।रचना में इस अनजाने और अनदेखे बंधन पर ही विचार किया गया है । मनुष्य की पहली इच्छा की ओर बढ़ना ही इच्छाओं की अनवरत क्रम का द्वार खुल जाना है । पुराणों में ऐसे बहुत से प्रसंग और कथाएं प्रचलित हैं जहां किसी न किसी प्राणी ने अपनी इच्छा पूर्ति के बहुत सारे प्रयास किये और वे प्रयास निष्फल ,असफल भी रहे ।लंका के राजा रावण ने अमरत्व और स्वर्ग तक स्वर्ण सीढ़ी बनाने की इच्छा अपने मन में पाली थी लेकिन यह मनोकामना असफल हुई। इस तरह मनुष्य भी इच्छाओं का दास है ।पानी के पहिले घूंट से ही मनुष्य तृप्ति की आस बांध लेता है ।यह तृप्ति का अधूरा रहना ही तो भटकाव को जन्म देता है । संसार में तरह – तरह की इच्छाएं हैं और उनके तृप्ति के जरिए भी अलग – अलग हैं । मनुष्य इन इच्छाओं के चक्र में इस तरह ग़ाफ़िल हो जाता है कि शीतल पानी भी तेजाब की तरह अम्लीय और तीखा होता है ।पहली इच्छा की पूर्ति करने के प्रयास अन्तहीन इच्छाओं को जन्म देते जाते हैं । यह इच्छाएं हमें लालच ,लालसा में डूबाती जाती है । पानी की प्यास और तीस , अतृप्ति ही तो वह ज्वाला मुखी है जिसमें चेतना रुपी ठण्डी चट्टान ढंकी है ।यह चेतना किस प्रकार की है ।यह चेतना मुक्ति की चेतना है जो इच्छाओं से मुक्त होना चाहती है ।भीतर से उठती हुई आग जो चेतना से इच्छाओं को भस्म कर देना चाहती है । मनुष्य के मन में जलती मुक्ति की आग ही वह चेतना है जो दासत्व तक पहुंचाती हुई इस इच्छा रुपी प्यास को बुझाना चाहती है । मनुष्य की चेतना ,विवेक , संवेदना,सत्य, और करुणा को मुक्त कर देना चाहती है । भीतर भीतर गहरे तल तक । चेतना के तमाम स्तरों को पार करते हुए ठण्डी चट्टान के नीचे तक पहुंचना चाहती है । यह उस सोये हुए मन को भी जगा देना चाहती है जो अवचेतन है ।अचेतन है ।उस सब को जागृत करने की दबी इच्छा ? जो सचेत हैं ।आत्मा को सचेत करना ,मन को सचेत करना , हृदय को सचेत करना । भावनाओं पर विवेक का संयम रखना ।यही तो है पहली इच्छा के घूंट पर विचार का संयम रखना । विचार ही वास्तविक ज्ञान है ।अपनी इच्छाओं पर ज्ञान ,विवेक ,और विचार का संयम ही इच्छाओं का शोधन है ।शोधन ही जागृति है । इच्छाओं को जानना ही विवेक है । इच्छाओं का दासत्व स्वीकार नहीं करना ही विवेक है ।विचार की आग ही तो वह ज्वाला मुखी है जो दास्तां से मुक्त करता है ।
विनीता रघुवंशी
