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मंगल दिवस के प्रति — मन्ना को -आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
मंगल दिवस के प्रति — मन्ना को
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( १ )
आज रविवार है
बलड़ी से नर्मदा के बड़केश्वर घाट पर
काफी जल्द आ गया हूं
घाटी के
ऊंचे टीले पर बैठा हूं
जहां पीपल ,नीम, और बिल्व खड़े हैं
इनकी ममतामयी छांव में
एक अलग मजा आ रहा है
और इससे भी मजेदार है
रेवा के जल में झांकती इनकी मुद्राएं
एक कछुआ —
नदी में गिरते
इन वृक्ष – प्रतिबिम्बो से खेल रहा है
जिसे देखता हुआ
दौड़ाता हूं
पूरब से पश्चिम तक निगाहें
दूर – दूर तक
किनारों के उतार -चढ़ाव
सघन वृक्ष – पंक्तिया
कर रही है वन्दन
रेवा मुड़ – मुड़ कर
स्वीकारती जा रही है
सबके नमन
धारा के बीचों बीच
मगर – सी पसरी
एक विशाल शिला
निगाहों में गड़ गई
और घाटी
इस बात पर अड़ा गई कि भाई —
प्रेमशंकर तू फिर से सारी चीजों को देख !
देखता हूं कि टापू :
जो नर्मदा के बीचों बीच खड़ा है
किनारा नहीं बन सका
टापू : जो धारा में है
नहीं हो सका धारा
नदी में होकर भी
उसका नहीं हो सका
हिन्दुस्तान में
ऐसे कितने ही टापू हैं जो
धारों के बीचोंबीच अड़े हैं
ये नदी से
या उसके आसपास से सब कुछ लपेट कर
मुटियाते जाते हैं
अंधे अफसर हों
या निठल्ले नेता
या मुस्टंडे महन्त ,परकम्मावासी
या भीतर ही भीतर पानी चुराने वाले कोई ओर !
ये टापू : ये प्रवाह के अवरोध
नदी के बीचोंबीच अड़े हैं
तिसपर इनका तुर्रा ये कि हम —
नदी के सौन्दर्य होते हैं
इसीलिए बहती नर्मदा में
अपने मंतव्यो के हाथ धोते हैं
ये मछलियां :
इनको कौन – सा विशेषण दूं
जल समाज में रहकर भी
अपनी तलवार नुमा रीढ़ों से
मगर वृत्ति का विरोध नहीं करती
और ये किनारे :
पर्याय हैं गन्तव्य के
गौतम हों या महावीर या मार्क्स या गांधी
ये किनारे ही तो बने बहती रेवा के
तभी तो
इनके सहारे
कितने ही पेड़ पौधे
तृण – गुल्म – लताएं
लहलहाते कछार
पा सकें हरियाली का सदाचार
(कविता का शेष अंश कल )
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज की कविता हिन्दी साहित्य के पद्य इतिहास का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जिससे “पत्र शैली ” में भी कविता रची जा सकती है । आज वर्तमान समय में सोशल मीडिया की जन जीवन में उपस्थिति ने मनुष्य को “पत्र लेखन ” जैसे सरल तरीके से दूर कर दिया है । पत्र जीवन में संदेश पहुंचाने के बहुत अच्छे जरिए थे और उनमे व्यक्ति अपनी मन की बात खुल कर एक – दूसरे को पहुंचा कर सुकून और शान्त चित्त रहता था ।पत्र माध्यम थे कुशलता जानने के ,घर – परिवार – और गृहस्थी के हाल – चाल जानने के ।अपने मन के आनंद और अवसाद को जताने के ।आज वर्तमान संसाधनों ने यद्यपि तीव्र गति से संदेश भेजने के ऐसे – ऐसे साधन ईजाद कर लिए हैं लेकिन फिर भी मनुष्य तनाव ग्रस्त हैं , अपनी सरल अभिव्यक्तियों को व्यक्त नहीं कर सकता ।पत्र ही वह माध्यम था जिससे मनुष्य मनुष्य के नजदीक महसूस करता था ।पत्र बहुत अच्छा जरिया था कि जिनके सहारे आदमी आदमी से बतियाता था ,रुठता था , मनुहार करता था यह सब होता था पत्र के जरिए ।आज आधुनिकता ने आदमी से यह माध्यम छीन लिया है । आज का यह खत वर्तमान समय की पड़ताल करता है ।यह पत्र लिखा गया है मन्ना को याने हिन्दी के जाने माने गांधीवादी रचनाकार स्वर्गीय श्री भवानी प्रसाद जी मिश्र के सिवनी – मालवा में हुए अभिनन्दन समारोह के उपरान्त । मन आनंदित है ।अपने कर्म स्थली पर रघुवंशी जी व्यवस्थित हो चुके हैं और हरसूद के पास बड़केश्वर घाट पर बहती नर्मदा किनारे अपना रविवार अवकाश का दिन व्यतीत कर रहे हैं ।केवल यह दिन ही व्यतीत नहीं किया जा रहा वरन नर्मदा के बीच उभरे दृश्यों को भी वैचारिक दृष्टिबोध से फिर – फिर दृश्यावलोकन किया जा रहा है ।नर्मदा के इस दृश्य पटल पर उभरते टापू,कछार, प्रवाह ,धारा सब एक नये अर्थ में अपने वजूद को प्रस्तुत करती है ।यह देखना सामान्य जलधारा को देखना नहीं है ।यह देखना देश के उन हालातों को भी देखना ,समझना,और बोध ,चेतना ,से देखना है ।देश के विकास में अड़े अवरोध भी यहां सीधे – सीधे और सरलता से महसूस होते हैं ।अपनी निगाहों को पूरब से पश्चिम तक दौड़ाना याने उस वैश्विक व्यवस्था को भी आंकने की कोशिश जिसके और नर्मदा के प्रवाह का फैलाव है ।ऐसा लग रहा है मानो नर्मदा सबके नमन स्वीकार रही है । यह सब देखते हुए नर्मदा के बीच मगर – सी शिला नजरों में गड़ गई ।नर्मदा के बीचोंबीच टापू है जिसने अपने अस्तित्व को अलग – थलग बना रखा है ।वह नर्मदा में रहकर भी नर्मदा नहीं हो सका ।जो धारा में रहकर भी धारा नहीं बन सका यह कैसा अहंकार है टापू का जो देश हित की तो बात कर रहा है लेकिन देश की सरजमीं से घुल-मिल नहीं सका ।यह विडम्बना ही तो है व्यक्तित्व की । जो नदी में है लेकिन जिसने प्रवाह में अपने अस्तित्व को सर्वस्वीकृत नहीं बनाया ।यह टापू कौन – कौन से हैं जिन्होंने अपनी पहचान ,अपना परिधान ,अपना वैचारिक रूप देश की मुख्य धारा से भिन्न रखा : ये टापू हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मुस्लिम लीग,हिन्दू महासभा आदि । इनमें विदेशों की वैचारिक सभ्यता का आकर्षण और प्रभाव समाया हुआ हैं ।ये देश की इसी संसाधनों को समेट रहे हैं और मानसिक दासता के प्रमाण – चिन्ह उकेरे समाज में व्याप्त है। अपने भीतर की तल्खी को व्यक्त करते हुए गुस्सा फूट रहा है उन अफसरों के प्रति जिनमें दृष्टिबोध नहीं है ।अपने समाज को समझने की बुध्दि नहीं है ।जो आज भी आजाद भारत में ब्रिटिश सत्ता के नुमाइंदे बने अंग्रेजी कानून – व्यवस्था का पालन-पोषण और अमल कर रहें हैं नेता सत्ता भोग में डूबे निठल्ले हो चुके हैं । उन्हें जनता के दुख – दर्द ,पीड़ा ,संताप ,यातना, संघर्ष नहीं दिख रहे हैं ।या भीतर ही भीतर पानी चुराने वाले कोई और कहकर उनकी पहचान को छोड़ दिया ।यह वह माफिया या अपराधी समूह है जो समाज को नुक्सान तो पहुंचाता है लेकिन पकड़ में नहीं आता है । जिसकी छवि स्पष्ट नहीं है ।ये अपराध समूह ही अपने आपको समाज के विशिष्ट वर्ग में शामिल होकर समाज की अगुवाई करते हैं ।अपने आपको समाज की शोभा बढ़ाने वाला मानते हैं लेकिन यहां सवाल उठता है कि जो समाज में काले धंधों के मालिक हैं वे समाज की भी सच्ची शोभा हैं ? यह विचारणीय विषय है ? इस पर गौर किया जाना चाहिए ? समाज की मर्यादा ,समाज को नुक्सान पहुंचाने वाला यदि समाज का सम्मानित व्यक्ति होगा तो फिर समाज ही सवालों के घेरे में खड़ा हो जायेगा ।आज वर्तमान समय में यही हो रहा है इस पर चिन्तकों, विचारकों,बुध्दिजीवियो को गहन विचार करना चाहिए । समाज तो निष्कलुष व्यक्तियों का समूह होता है । यहां तो समाज की मूल अवधारणा और चेतना ही नष्ट हो जाती है । “बहती गंगा में हाथ धोना “” बहती नर्मदा में हाथ धोना ” याने अवसर का पूरा – पूरा लाभ उठाना ,मौके का फायदा उठाना । अपने स्वार्थ सिध्द करना ।ये ऐसे टापू हैं जो इस तरह बहाव में अड़े हैं ।नर्मदा में जल क्रीड़ा करती ऐसी बहुत सी मछलियां हैं जिनके पास नैतिकता ,सदाचार की मजबूत रीढ़ है जो अपनी तीखी तलवार से दृढ़ विचारों से व्यवस्था पर आघात ,प्रहार ,और प्रश्न नहीं करती ।ये मछलियां हैं ,गांधीवादी विचारक, मार्क्सवादी विचारक,पत्रकार ,साहित्यकार , प्रोफेसर, इंजीनियर,डाक्टर, चिन्तक,वकील ये सब नर्मदा में तैरती मछलियां हैं और इनके पास नैतिकता ,मूल्य चेतना की धार है । ये अपनी” धार ” अपने पैने पन का उपयोग क्यों न ही करती व्यवस्था को सुधारने के लिए ? मगर वृति संकेत है आलस्य के ,निकम्मे पन के लिए । गौतम ,गाधी ,महावीर, और मार्क्स ये सब उन रास्तों के संकेत हैं जिन पर चलकर देश अपनी संस्कृति के खोये हुए अनमोल विचार पुनः रच सकता है ।गौतम के पास करुणा का संदेश है तो महावीर के पास अहिंसा ,अस्तेय,अपरिग्रह, की चेतना है , गांधी के पास सदाचार है तो मार्क्स के पास सामाजार्थिक समृध्दि की संवेदना है । इन सब से ही देश के कूल और कछार हरियाली का सदाचार अपना सकते हैं ।यह पत्र – कविता वैचारिक है । ( कविता का शेष अंश कल ) 🙏 विनीता रघुवंशी

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