4
मंगल दिवस के प्रति —- मन्ना को
****************************
( २ )
( पत्र कविता का शेष अंश )
किनारों की संस्कृति
नदी का संतुलन बनाती है
बड़े सम्मोहन से
सभ्यता की वंशी बजाती है
माटी या रेत हो तो ऐसी
जो – वैसी चमके –दमके —वैसी गमके
घाटी से उतर कर —
किनारे से
ले रहा हूं रेवा के जल का आचमन
छिड़क रहा हूं अपने और आसमान ऊपर छींटे
जिनसे रात लिखेगी भोर तक
कोई नई कविता
ताज़ा – ताजा गंध संहिता
देव उठनी ग्यारस के बाद
सिवनी मालवा गया पहली बार
बाई ने जीजी -शारदा –पुष्पा
संपत – भाभी ,आशा ,विद्या के साथ
घर के आंगन
जो चौक माण्डे हैं
उन्हें देखता रहा
आंगन का माण्डना तो वैसा ही है
जैसा हर साल
इस पर्व पर देखता आ रहा हूं
किन्तु मंजोठे में
नील – गेरु- सफेदा से
अब के नए चरण बने हैं
जिन्हें देखते ही हम
आश्चर्य में सने हैं
मां ने बताया कि —
अबकी रेवा अपने घर जिन – जिनको लाई थी
उन सबके चरण उकेरे हैं
चन्दा, श्री और इन्दु ने
मन्ना तभी से डूबा हूं मैं — भाव सिन्धु में
जहां हिलोरों पर हिलोरें ले रहा है मेरा मन
ओ – रे – ओ — आज के मंगल दिवस
तेरा अभिनंदन ! तेरा अभिनंदन !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
नोट : — १८ नवम्बर १९७३ बड़ी के बड़केश्वर घाट पर बैठकर भवानी प्रसाद मिश्र को लिखा गया पत्र — सिवनी – मालवा के उनके अभिनंदन के बाद ।
यह एक ऐतिहासिक पत्र और साहित्य का दस्तावेज ही है। आज तक साहित्य में बहुत से अभिनंदन हुए और किये गये ये सब अभिनंदन समारोह धन की बदौलत हूए ।सिवनी – मालवा में हुआ मन्ना अर्थात श्री भवानी प्रसाद मिश्र जी का यह अभिनंदन समारोह अनूठा ही बन पड़ा क्योंकि जब अभिनंदन समारोह तय तिथि पर परिवहन के साधनों की याने रेलवे और बस की हड़ताल हो गई अतिथियों को अभिनंदन स्थल तक बैल गाड़ियो से लाया गया । यही नहीं इन बैलगाड़ियों के रुकने – खुलने के लिए मैदान और चारे – पानी का भी इंतजाम अभिनन्दन समिति ने किया । मुझे ठीक – ठीक तो याद नहीं लेकिन चौसठ बैलगाड़ियों की यह अनूठी यात्रा थी जो मन्ना के अभिनन्दन के लिए जुटाई गई थी ।सभी साहित्यकार उत्साह से शामिल हुए ।इसी को याद करते हुए यह पत्र – कविता मन्ना को लिखी गई ।पत्र में सब हालचाल है ।नर्मदा के घाट का मनोरम चित्र है ।एक बड़े। दायित्व को निभाने का आनंद है ।पत्र में आस्था है ,नर्मदा के प्रति जो झलक रही है आचमन , अपने तन बदन पर जल छिड़कना और आसमान तक नर्मदा के जल को स्पर्श कराना ताकि एक नई कविता प्रकृति रच सकते ।कितनी मनोहारी कल्पना है । एक ताज़ा ताज़ा गंध – संहिता ।यह संहिता तो श्रृंगार शतक की तरह है जिसमें प्रकृति के सौन्दर्य के नियम – परिनियम समाहित है । नई खुश्बू का विधान है ।प्रकृति की सुरम्यता है । मंजोटे में आगंतुकों के चरण उकेरना भी कितना भाव भीना है ।अतिथि देशों भव की धारणा से रचा – बसा । किनारों की संस्कृति हर हमेशा मनुष्य के जीवन को मर्यादा और संयम के किनारों में संतुलित रखती है ।समाज की जो सांस्कृतिक विरासत है वह संयम,और मर्यादा का पालन करते हुवे ही सभ्यता को रचती है ।माटी या रेत हो ऐसी जो चमके । जिसमें संयम का किनारा हो और आत्म सम्मान की चमक हो ।तब ही प्रेम की वंशी की स्वर लहरी सम्मोहित करेगी ।बिना मर्यादा के सभ्यता और संस्कृति में कोई आभा नहीं होती , उसमें कोई कांति नहीं होती ।वह दमकती नहीं है ।न ही वह गमकती याने अपनी आत्म गंध भी नहीं फैलाती है ।खुश्बू का भंडार ही पूरे पर्यावरण में नहीं खोलती है । मनुष्य मनुष्य के परस्पर प्रेम की गंध ही तो है सभ्यता और संस्कृति की मोहक वंशी – स्वर ।वंशी की सुमधुर तान । यही सम्मोहन ही तो श्री कृष्ण की बांसुरी का भाव सम्मोहन है जिससे सभी खिंचे चले आते हैं ।यही तो प्रेम की सभ्यता है यही संस्कति की मूल चेतना है ।कविता में पत्र की सहजता है ,गीत सी तुक बन्दी है — यथा — आश्चर्य में सने हैं ” यह कितना आस्था मय है कि रेवा जिन जिनको घर लाई उन सबके चरण उकेरना ।आज वर्तमान में यदि कुछ घटा है ,कुछ कम हुआ है तो वह आतिथ्य – सत्कार का भाव ? आज फ्लेट संस्कृति ने आदमी – आदमी के बीच का परस्पर लगाव छीन लिया आत्मीयता छीन ली और कृतार्थ भाव छीन लिया । मनुष्य वर्तमान में अपनी भाव सम्पन्नता से रिक्त हुआ है । उसके हृदय में भावातिरेक की अवस्था ही उत्पन्न नहीं होती इसीलिए वह भावनात्मक खिन्नता , तनाव , ग्रंथियों में विचरण करता है ।पत्र लिखकर आदमी अपनी सहज अभिव्यक्ति के नजदीक पहुंच जाता था । भाव – सिन्धु में डूब सकता था लेकिन आधुनिकता ने यद्यपि हमें त्वरित संचार साधनों से जोड़ दिया है फिर भी आदमी फिक्र मंद है ।उसकी चिन्ता ,उसका एकाकी पन बढ़ा ही है ।पत्र मनुष्य की सहृदयता के जरिए थे जिनसे वह आपस में अपनी भावाकुलता को – पढ़ -सुन और लिख सकता था . यह लिखने का अभ्यास ही उसे जीवन्त बनाए रखता था ।उसके मन में जानने की जिज्ञासा बनी रहती थी ।आज यह जिज्ञासा के खतम हो जाने की वजह से ही आदमी की संवेदनशीलता शून्य में बदल गई ।आज के संसाधन आदमी को सूचनाओं से भर रहा है लेकिन उसका ज्ञान का कोष रिक्त ही है ।वह कोरी सभ्यता में जीवन व्यतीत कर रहा है । संस्कृति की सहृदयता उसमें से निकाल दी गई है । इसलिए भाव – शून्य स्थिति उसे आत्म हीन विकलता देती है ।यह मनुष्य की उन्मत्त दशा है बिल्कुल मणि हीन अश्वत्थामा की विक्षिप्त अवस्था सी । आदमी को अपनी सहज अभिव्यक्ति के लिए फिर से पत्र लेखन की ओर लौटना होगा ।भाव – सिन्धु ही आदमी की चेतना ,मन और आत्मा की वास्तविक हिलोरें हैं ।यही सच्चा मंगल दिवस है जिसमें भावना की तरलता है । हर दिन मनुष्य के जीवन का अभिनंदन दिवस है । जिस दिन वह पत्र लिखे ,अपनी भावना व्यक्त करें उसी दिन का वास्तविक अभिनंदन ।लेखन मनुष्य की सहज चेतना है यही विद्या है ।यही कला है ।
विनीता रघुवंशी
