3
दगरु दा
*********
( २ )
( कविता का दूसरा अंश )
गाने लगते वे भी
तरंग में आकर नाचने लगते
खुलती चुटइया उनकी तीन – तीन हिस्सों में
बल खाकर नाचती— बिलकुल उनके जैसी
बच्चों को घेरे सुनाते वे किस्से और फिर
फिक्र फिक्र चल पड़ते दगरु दा
खिल खिलाते बच्चे साथ – साथ दौड़ते
पसीने से लथपथ जब सुस्ताने बैठते
गांव के तीनों पथ
जोड़ते तिगड्डे पर
लगाते हुए अरथ
हर एक राह का
ठह – ठहाते ठह – ठहाते एकदम रुक जाते
नजरें गड़ाये उस राह पर —जो
जो मेड़ों की पगडंडियां जोड़ती
जमींदार की हवेली में जाकर खो जाती
बीच में अस्पताल देखकर कहते वे
” मरघट्या मार्ग है “
इससे ही मुन्नु को लेकर वे गये थे
स्वास्थ्य – लाभ के खातिर — और
मुन्नु को वहीं छोड़ — देह भर लिए उसकी
लौटे थे इसी राह
हंसते हैं वे फिर से —और
ठहर जाते हैं
दूसरी राह पर डालते हुए दृष्टि
जाती जो जंगल को
गायें चराने वे कभी वहां जाते थे
माई के कहने से
सईं सांझ बाड़े में बांधते – बांधते
जो गिनते — तो कहते — आज फिर
कसाई ने मार दी एक गाय
” कस्साबी रास्ता “
निकला उनके मुंह से — और तब
देखने लगे उस राह पर
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
(आज कविता का दूसरा अंश कल अन्तिम और तीसरा अंश )
दगरु दा एक आम व्यक्ति हैं जिसके सुख और दुख दोनों सीमित हैं । न घना न कम । हर आम आदमी की चेतना और विचार कविता के अनुभव को सर्व व्यापी बना देते हैं दगरु दा । दगरु दा जीवन की हकीकत को अपने साथ घटित हर घटना से जोड़ कर देखते हैं और जिन रास्तों से उनके जीवन में दुख आया उस पर गहराई से सोचते हैं । जहां पुत्र की मौत हुई वह अस्पताल मरघट्या मार्ग बन गया। ? यह कितना संवेदना भरा अनुभव है कि गांव में अस्पताल तो है लेकिन इलाज नहीं ? वहां से केवल देह लौटती है प्राण नहीं ,जीवन नहीं ? यह कितना बड़ा प्रश्न है कि गांव में अस्पताल क्यों है ? जब वहां इलाज के लिए चिकित्सक नहीं ? यह व्यवस्था पर खड़ा किया सवाल है । ऐसी प्रशासकीय व्यवस्था का क्या मतलब जो जान न बचा सके ।ये सब तो सत्ता के थोथे दिखावे हैं । इसीलिए अस्पताल “मरघट्या रास्ता ” है । वर्तमान में कोरोना काल में इस हकीकत को जन – जन ने खूब महसूस किया ।जब इलाज के अवसर पर चिकित्सा और चिकित्सक का मोल वसूला गया । देह को मौत के हवाले किया गया और कफ़न को भी नोंचा लिया गया ।व्यवस्था की क्रूरता के तमाम किस्से इस “मरघट्या रास्ते “पर अवाम को सहने पड़े ? मरघट्या रास्ता दगरु दा की अकेले की ही त्रासदी और अनुभव नहीं यह तो जन मन को कंपा देने वाली सच्चाई है । जहां नकली दवाई ,नकली आक्सीजन ,नकली इलाज , और नकली सेवा के बहुत से प्रमाण नजरों के सामने से गुजरे लेकिन जीवन की चेतना का सच्चा नजारा बहुत कम देखने को मिला । दगरु दा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बच्चो से घिरे अपने अनुभव के किस्से कहानी सुनाते रहते थे यह जीवन अनुभव ही उनकी कहानी का हिस्सा बन जाता था यह कितना त्रासद और यातना भरा है कि व्यवस्थाएं ही खुद किस्सा ,कहानी बन जाये कल्पना लोक तो सूना ही पड़ा रह जाये ।दगरु दा के सामने भावनात्मक शून्य है जिसे वे अपने मुन्नु की स्मृतियों से भर रहे हैं । वे अकेले हंसते हैं ।खुद पर नहीं ! वे हंसते हैं उन व्यवस्थाओं की खामियों पर जो हर बार एक नई घटना के साथ उनके अनुभव संसार में कुछ नया जोड़ देती है । यह जीवन की दूसरी राह है जो मवेशी चराने को जाती है । लेकिन जब साझ को बाड़े में गायों को गिनने पर हर बार गाय का कम हो जाना और कसाई का गाय चुरा लेने की घटना दगरु दा को एक नये अनुभव से जोड़ती है । जंगल की राह उन्हें” कस्साबी रास्ता ” लगता है ।क्या इस तरह कसाई का गाय चुराने का कर्म सामाजिक व्यवस्था और नैतिकता पर उठाया गया सवाल नहीं है । जो समाज इस तरह परस्पर धोखा ,कपट,झूठ , और अपकर्म से संचालित हो रहा हो वहां जीवन में मूल्य चेतना तो सिफर ही होगी ? इस सिफर पर याने शून्य नैतिक आचरण पर टिका समाज अपने शैक्षणिक उत्कर्ष के सपने कैसे देख सकता है ? उसकी समस्त राजनैतिक,धार्मिक,सामाजिक,न्यायिक , आध्यात्मिक ,शैक्षणिक ,प्रशासकीय , व्यवस्थाएं भी सवालों के घेरे में होगी ? इस तरह जिस तरह का पतन समाज और जन जन में दिखाई पड़ेगा वह समग्र चेतना ,संवेदना ,करुणा ,सत्य की प्रामाणिकता को नष्ट ही करेगा ।आज समाज को अपनी चेतना पर विचार करना चाहिए । अपने नैतिक आचरण के मूल स्वरुप को टटोलना होगा ।रघुवीर सहाय की पंक्ति याद आ रही है —” लोकतंत्र का अन्तिम क्षण है कहकर आप हंसें “
सचमुच हम आज अपनी गिरावट पर चिन्ताग्रस्त नहीं है ।हम हंस रहे हैं व्यवस्था की गिरावट पर लेकिन यह गिरावट व्यवस्था की नहीं हमारी खुद की गिरावट है ।जनता की गिरावट है ।यह लोकतंत्र का नहीं लोक का अन्तिम क्षण है । जहां लोक अपने अस्तित्व को खतम कर रहा है और आराम की मुद्रा में है ।सब कुछ गुजर रहा है किन्तु कोई चिन्ता नहीं ? यही तो है — ” कस्साबी रास्ता ” अपने आपको खतम करने का रास्ता । दगरु दा सजग होने के नतीजे पर सचेत कर रहे हैं (कविता का अन्तिम अंश कल )
विनीता रघुवंशी
