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दगरु दा-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
दगरु दा
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( ३ )
( कविता का अन्तिम अंश )
देखने लगे उस राह पर
जिससे हर पांच बरस बाद
इस गांव में
आती रही कारें
जाती रही जीपें
झण्डो को फहराती —उछालते हुए नारे
बदल – बदल पोशाकें –लहलहाती फसलों पर
जैसे कि टिड्डी दल
‘चुनाव मार्ग ,– मेरे इस गांव का ‘
और अन्त में
खड़े हो जाते यह कहकर –कि बच्चों !
दाएं बाजू ही होते हैं सारे एक्सीडेंट
बाएं से चलने वाला
पूरी करता है अपनी यात्रा
हमेशा बाएं से चलो
कीप टू द लेफ्ट !!
ऐसे में दगरु दा –फरिश्ता हो जाते हैं
जिनका संदेश सुनता है पूरा गांव
आत्म विश्वास लिए
अपने गले में टांग कर पुरानी ढोलकी
बार – बार थपियाते हुए वे
जोर – जोर से चीखते
‘कीप टू द लेफ्ट ‘ –बाएं से चलो
और घर आ कर
अपनी बूढ़ी पत्नी से
मुन्नू बनने की जिद्द करते हुए
उसकी गोद में कुनमुनाने को
ललक उठते हैं दगरु दा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता अन्तिम रास्ता त्रासदी से भरा है ।यह रास्ता चुनाव का रास्ता है । जहां बातें चलने की ताकीद है ।दगरु दा की समग्र चेतना यहां हनन का अनुभव करती है ।वे निढाल होते हैं । वे हारते हैं ।अपने आपको अबोध बालक में रुपान्तरित करते हैं ।”बातें ” चलने का चुनाव उनको असफल करता है ।यह “दायां “और “बायां ” क्या है ।यह राजनीति की दो प्रेरक विचार धारा है । दायां याने वामपंथी विचार धारा जो मानव चेतना की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है । दूसरी ” बायां ” मतलब जो महाजनी सभ्यता के व्यूह में उलझा कर मनुष्य को दासत्व के फेर में फंसाती है ।एक ओर मानवीय श्रम की महत्ता पर विचार करती है और दूसरी धनपतियों के मुनाफे को ,पूंजी को दिन दूना रात चौगुना करने के रास्ते ईजाद करती है । इसीलिए दगरु दा –बुदबुदाते हुए — कीप टू द लेफ्ट ( बायें चलो – बायें चलो ) कहकर अबोध बन जाना चाहते हैं ।अपनी आशाओं से रिक्त पत्नी से वात्सल्य की उत्कट चाह जागती है ।वे यहां अपनी हार महसूस करते हैं । उनकी वैचारिक मन: स्थिति टूट जाती है । यह टूटन का विकल्प है अपनी बोधता को अबोध पन में बदल देना । यह “चुनाव मार्ग ” गांव की चेतना की फसल पर “टिड्डी दल” की तरह चाट कर जाता है ।यह कितना त्रासद है इसकी अनुभूति दगरु दा की चीख से अनुभव किया जा सकता ।उससे भी ज्यादा त्रासद है अपने गले में पुरानी ढोलकी का लटका देना ।यह एकदम नाटकीय परिवर्तन है ।जो व्यक्ति व्यवस्था के स्वरुप पर विचार कर रहा है और अपनी चिकित्सा,अपनी सामाजिक नैतिकता पर सवाल खड़े कर रहा है वही चुनावी मार्ग के चयन में विफल हो रहा है । क्यों वह –” दायें ” का चयन करने में चूक जाता है ।वह वैचारिक भेड़ चाल के जाल में उलझे जाता है ।उसकी वैचारिक दृष्टि उसे मकड़ जाल में उलझा देती है ।वह नहीं कह पाता दायें रास्ते पर चलने की बात ।यही तो आम आदमी की हार और विफलता है ।वह अपने हित स्वयं तय नहीं कर पाता ।वह प्रचार- प्रसार के शोर में भटकता है और हर पांच साल में चुनाव के समय छला जाता है ।यही दगरु दा की पीड़ा है ।यही हर उस व्यक्ति की त्रासदी है जो दगरु दा की तरह सामान्य और साधारण है । जिसके पास विचार करने की तो सामर्थ्य है लेकिन चयन के समय चेतना का विस्मृत हो जाना ।छटपटाहट है ।ईच्छा है लेकिन ? ज्ञान – बोध का विस्मरण ? उन्हें नासमझ बना देती है ।चेतना के अबोध पन में डूब जाने को विकल हैं दगरु दा ।अपनी ग़लती का अहसास उन्हें ममता की छांव तले छुप जाने को विवश करता है ।क्या यही गहरी भूल की आत्म स्वीकृति ही तो नहीं है मुन्नु बन जाने की कुनमुनाहट ? यह हार है लोकतंत्र में नागरिक चेतना के लोप की ? यह हार है अपने संवैधानिक अधिकार के छीन लिए जाने की । यह दुख और पीड़ा है अपनी आजादी के छिन जाने की ? दगरु दा यहां “खो ” देने वाला अकेला नागरिक नहीं है ? यहां हर नागरिक अपनी संवैधानिक अवस्था -“खो”चुका है ।सब दगरु दा की तरह अपनी अबोधता के जाल में उलझे हैं । चारों तरफ चुनाव के नारों का शोर है और नारों में फिसलता नागरिक चेतना के हरण की पीड़ा से ,दुख से ,संताप से आहत है ।दगरु दा निरुपाय हैं ? भारत के संविधान से बंधा हर नागरिक इस निरुपायता का दुख सहन रहा है । विकल्प शोर का नहीं है लेकिन वैचारिक मौन का गहरा महत्व है । दगरु दा की त्रासदी ही गहरी होकर विकल्प पर विचार करने की चेतना का उत्प्रेरण ही सही रास्ता है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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