Home Archives
Monthly Archives

June 2025

इतनी रात गये कन्देली बह रही है *************************** ( १ ) रोशनी के पहले हल्ले में मेरे गांव जमानी बैंगनियां की कन्देली नदी के ओर – छोर कहीं भी नहीं …

उसे भी पहचानता हूं ****************** हवा को कौन नहीं महसूसता —लेकिन मेरे सामने की बहती हुई नदी जब उसका सही चित्र अंकित कर लेती—तब लहरों का एक लम्बा काफ़िला सागर …

आग के बारे में ************* महामारी का शहर में आना –और नदी का सूख कर कांटा होना बजाय पानी के लिबाटियां उतार देता है हलक के भीतर आंतों में कांटों …

मौसम का इन्तजार करो ******************** मैं जहां जहां जब – जब जिसे भी टटोलता वह फूलों से लदा पलाश नहीं होता जंगल से पूछ बैठता आखिरकार —– इन पेड़ों को …

फिलहाल ******** अभी मैं इतना अन्तरराष्ट्रीय भी नहीं हुआ कि अपने घर की आग बुझाना छोड़ कर दूसरों के लिए मेघ मल्हार गाऊं मुझे अपने घर की छतें और दीवारें …

अपने जीर्ण वस्त्र *************** वह —- किसी मौसम की मेहरबानियों पर फलने – फूलने या जिन्दा रहने वाला पेड़ नहीं है उसकी जड़े उसकी ऊंचाई से भी ज्यादा तुम्हारी ढाई …

मेरे हाथ ******* जितनी बार मशालें थमायी उतनी बार चुपके – चुपके अंधेरे से समझौता कर लिया इतिहास ने कहा —- कि हाथ न जले इसलिए तुम बार – बार …

उठे हुए फन की तरह ***************** मैं देखता हूं साफ सात्विक भाव को पहने ओढ़े लोग आदमी का मांस खा रहे हैं नहीं आती नींद सुकून की ! इसलिए जागते …

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More