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कविता

प्रस्तुत ******** ( २ ) धूप के माथे उठा कर धुएं की शिकने अब न जायेगी कहीं भी रोशनी बिकने अब न अन्ना बटेरों को खायेगा अब न बौनापन शिखर …

वह **** ( ९ ) वह सदा से अन्य पुरुष सर्वनाम ही रहा मध्यम ने पीसा उत्तम ने बरसाये कोड़े अब उसे —– भाव वाचक संज्ञा बनाया जा रहा प्रत्ययों …

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