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कविता

आंगन ***** ( ३ ) कब टूटेंगी चिटकनियां ? कब खुलेंगी सांकलें ?? टकटकी लगाये घर को गोद में बिठाये बावला है आंगन ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …

प्रिया **** ( ४ ) क्यारियों से कचरा उखाड़ती हटाती तुम्हारी अंगुलियां पहले से ज्यादा अच्छी लगने लगी हैं मुझे ज्यादाह अच्छे लगने लगे हैं चिड़ियों को चूनी चुगाते तुम्हारे …

प्रिया ***** ( ३ ) आजकल तुम सभी से हंसती – बतियाती हो सभी के सुख – दुख में होती हो शरीक प्यार की वो—- व्यक्तिगत लीक कितनी फूहड़ है …

प्रिया ***** ( २ ) यूं तो तुम नाज़नीन रही हो हमेशा से लेकिन खतरों के बीच इतनी जल्दी फन उठाए कर फुत्कारती नागिन बन जाना एक ऐसी मुद्रा है …

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