आंगन ****** ( ७ ) चाहे जिस गांव – कस्बे – शहर देश का हो आंगन : भूगोल नहीं होता जहां कहीं मर रहा होता कोई आंगन धीरे – धीरे …
कविता
आंगन ****** ( ६ ) घर के भाल का पसीना पोंछने आतुर है आंगन हरेक कारें का गमकता उत्सव है आंगन गांव की आह कराह का बंटाईदार है आंगन अब …
आंगन ***** ( ३ ) कब टूटेंगी चिटकनियां ? कब खुलेंगी सांकलें ?? टकटकी लगाये घर को गोद में बिठाये बावला है आंगन ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
आंगन ****** ( १ ) मुंह लटकाये उसांसें ले रहा आंगन हो न हो एक न एक तितली झुलसी होगी किसी न किसी कोने में । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी …
प्रिया ***** ( ५ ) आओ ,एक दूसरे को हम इतना बांध लें कि आलिंगन में कहीं भी सटक न सकें हमारे सपने हमारे संकल्प जो समाज के बीच इसी …
प्रिया **** ( ४ ) क्यारियों से कचरा उखाड़ती हटाती तुम्हारी अंगुलियां पहले से ज्यादा अच्छी लगने लगी हैं मुझे ज्यादाह अच्छे लगने लगे हैं चिड़ियों को चूनी चुगाते तुम्हारे …
प्रिया ***** ( ३ ) आजकल तुम सभी से हंसती – बतियाती हो सभी के सुख – दुख में होती हो शरीक प्यार की वो—- व्यक्तिगत लीक कितनी फूहड़ है …
प्रिया ***** ( २ ) यूं तो तुम नाज़नीन रही हो हमेशा से लेकिन खतरों के बीच इतनी जल्दी फन उठाए कर फुत्कारती नागिन बन जाना एक ऐसी मुद्रा है …
