वह **** ( ४ ) चिलम का कंकर साफ करते हुए वह देखता है भर दुपहरिया में आट्या – पाट्या खेलते बच्चे कि जिनका संसार चिड़ियों की चहक जैसा तोड़ …
कविता
वह ***** ( ३ ) दिन भर अच्छा लगा हजार – हजार हाथों से दिल खोल कर रोशनी जो बांटी सूरज ने बहुत बुरा लगा उसे गांव के मंदिर का …
वह ***** ( २ ) खेत से लौटा तो उसने पो पोवन्ती में नहाने का सोचा वह नदी उसके गांव को शिवपुर बनाये ऋतुओं के संग – साथ आज भी …
वह **** ( १ ) दिन भर खेत – खलिहान में खुटते उसने सूरज को धमेड़ दिया मुंह लटकाये चला गया बापड़ा सांझ का उजास उस हट्टोट को लहलहाते खेतों …
मेरे देशजों ********* ( २ ) मैं तुम्हारे अंदर मातृशक्ति की मशाल थामे खड़ा हूं महसूस करो तुम्हें भी यह यक्ष उसकी उष्मा लग रही होगी इस मशाल को कहीं …
मेरे देशों ******* ( सुभाष संदर्भ ) ( १ ) मैं अनादि से ही तुम्हें रक्त के बदले आजादी देता आया हूं देशजों ! मैं वह अंगार हूं जो सदा …
सोचती है उदया ************** छोटी बुआ कितनी अच्छी लगती साड़ी में मानो दुनिया भर की साड़ियां बुआ के लिए ही बनी है यह सोचते ही तय करती नन्हीं उदया कि …
नर्मदा की भोर ************* लताओं के शबनमी स्पर्श से खड़े हो गये पेड़ों के एक – एक रोम और बगुले अपने परों को तौलते खींचने लगे श्वेत लकीरें जल पर …
