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असलियत में फर्क नहीं पड़ता
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चांद , सूरज ,तारे ,
जो भी निकलते हैं
झील उन्हें अपने भीतर उगा लेती है
ये नक्षत्र और ग्रह
थरथराती झील में
अपने उदय को कैसे देख सकते हैं ?
कैसे देख सकता है उसमें
किनारों का परिवेश
अपना साफ सुथरा रुप
लहरों – लहरों हवा के साथ
आत्म प्रबंधन में भटकती
इस झील को
कौन समझाये –कि
प्रतिबिम्बों को टुकड़े – टुकड़े
करके खेलने से
चीजों की असलियत में
कोई फर्क नहीं पड़ता ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं” से उद्धृत )
आज की कविता का परिदृश्य बहुत गंभीर और विचार ,चिन्तन की परिभूमि पर ले जाकर खड़ा करता है ।कविता में बिम्बो को बाह्य तौर पर ग्रहण कर लेने से किसी भी विषय की चेतना में कोई अन्तर नहीं आता ।झील के गहरे जल पर उभरते प्रतिबिम्ब उसके अपने नहीं होते । जिस तरह किसी भी देश का समाज का इतिहास ,राजनीति ,विचार , धर्म ,अध्यात्म , आर्थिक नीति , सामाजिक सद विचार , परिवर्तन के विमर्श , सिध्दांत सब समाज की चेतना में से आने चाहिए न कि वे बाह्य स्तर पर नकल की तरह ओढ़ लिये जायें ।सब कुछ चेतना ,संवेदना ,करुणा ,सत्य के आभास के साथ सर्व स्वीकार्यता अन्दरुनी बदलाव की इच्छा के साथ समाज में जन – जन के वैचारिक परिवर्तन की अवस्था में प्रवाहित हों तब ही वह वैचारिक स्तर हकीकत में ठोस और स्थिर बदलाव में यक़ीन वाला होगा ।विश्व में कोई भी अच्छा विचार ,सिध्दात वह चाहे किसी भी सामाजिक हिस्से से जुड़ा हो वह समाज का असली हिस्सा नहीं होता वह तो केवल नकल और अनुकरण ही होता है ।वह चाहे इतिहास के बारे में हो या राजनीति के बारे में हो ,वह चाहे आर्थिक-सामाजिक नीतियों के बारे में हो वह समाज के गहरे तल से उठा हुआ बदलाव नहीं होता ।उसमें विचार ,चिन्तन ,और सिध्दात की चेतना समाहित नहीं होती ।जिस तरह चांद सूरज ,और तारों का प्रतिबिम्ब झील की गहराई से नहीं उभरते वे तो आसमान की परछाई से उदित हो रहे हैं ।झील स्वयं थरथरा रही है नये विचारों के प्रतिबिम्बों से ये समाज रुपी झील की गहराई से उठे हुए बदलाव के विचार नहीं है इसलिए इनमें अनुभव की ठोस जमीन भी नहीं है ।यह समाज रुपी झील की स्वानुभूति भी नहीं है ।झील रुपी समाज जब मार्क्स के विचारों को अपनाता है तो वह कोरा आदर्श लगता है क्योंकि जब विचार अनुभव की परिपक्वता से उत्पन्न नहीं तो वह बाह्य है चेतना की अन्दरुनी सतह से उत्पन्न होगा तब वह समाज के हर स्तर हर तबके हर वर्ग का सर्वमान्य विचार होगा ।इसी तरह यदि समाज में हिंसा से ,नफरत से बदलाव के विचार होंगे तो वह चेतना की ठोस जमीन का स्थाई विचार ही होगा ।बाहरी वैचारिक अवस्था वास्तविक बदलाव की भूमिका नहीं निबाह सकती । इसीलिए झील में उभरे बिम्ब भी झील की गहराई से नहीं निकले हैं । इसीलिए वे झील की विरासत संस्कृति नहीं है ।वैश्विक विचार और सिध्दांत भी भारतीय समाज की चेतना का अंग नहीं है । इसीलिए वह कालजयी नहीं है , काल कवलित होने की दशा में है । समाज अपनी निरंतरता में ही चलायमान रहता है कोई विचार उसमें प्रचलन में आता है और फिर समय के साथ तिरोहित भी हो जाता है समाज के बहुत बड़े हिस्से पर वह बेअसर रहता है ।जो असल है वह नकल से मिटाया नहीं जा सकता ।आदमी नकल करके अपनी छवि विराट कर सकता है लेकिन वह वैचारिक रुप में वामन है तो वामन ही रहेगा । छवियों से असलियत में कोई फर्क नहीं पड़ता । छवियां क्षणिक रचाव है और असल जिंदगी दीर्घ कालिक ठहराव है । झील में उभरे बिम्ब समय के साथ मिटते भी जाते हैं ।झील यहां समाज का राष्ट्र का प्रतीक है ।चांद ,सूरज, तारे वैचारिक आदर्श हैं जो समय समय पर समाज में उभरते हैं और मिट जाते हैं ।ये विचार ही हमारे समाज की, राष्ट्र की चेतना की विरासत नहीं होते इसलिए राष्ट्र की असलियत पर इनका कोई फर्क नहीं पड़ता । समाज समग्र रुप है राष्ट्र का इसलिए उसे छोटे छोटे वैचारिक परिदृश्य में नहीं आंका जा सकता ।वह राष्ट्रीय चेतना की मुख्यधारा में ही पूर्ण स्वरुप पाता है ।वह केवल वोट नहीं है वह हर वयस्क , बच्चों ,स्त्रियो बुजुर्गों के स्पन्दन में धड़कता है । इसीलिए राष्ट्रीय चेतना समग्र चेतना है ।इस चेतना को जातिगत आधार ,धर्म गत आधार या क्षेत्रीय आधार पर नहीं बांटा जा सकता । भारतीय के हृदय में बसा राष्ट्रीय भाव ही समग्र चेतना है । यह चेतना दलगत या जातिगत या क्षेत्रीय नहीं हो सकती ।समाज अपने व्यापक राष्ट्रीय चेतना के साथ देश के प्रति समर्पित होता है । वह दल गत स्वरुप की नकली वैचारिक रूप को पूर्णतः नकारता है ।
विनीता रघुवंशी
