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कमरे में
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कितनी बार
कर चुका हूं साफ
पूरे करीने से जमाते हुए अपना सामान
और
सलवटें ठीक करते हुए बिस्तर की
हर बार —
न जाने किस धुन की पूर्ति करती हैं इच्छाएं
मकान के चारों ओर
दिन दूने रात चौगुने
आकार बढ़ाते जा रहे हैं घूरे
और
पड़ोस में बांची जा रही सत्यनारायण की कथा
चौराहों पर भाषणों की बिछात
आश्वासनों के अम्बार
नारे उछालती भीड़ – हड़ताल
जीभें लपलपाते अजगर बोरों पर लेटे
अपने धर्म से गुजरती लीलावतियां – कलावतियां
बढ़ती शिक्षा और हरेक को मिलता
जोरदार रोजगार इतना कि —
सारा परिवार भरपेट भूखा –पूरी तरह
फिर से करना है साफ —
यह कचरा
करना ही पड़ेगा ।।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता में कमरा प्रतीक है देश का ,समाज का , राजनीति का , धर्म का ,नागरिक चेतना का ,आक्रोश का , व्यंग्य का । वर्तमान परिस्थितियों से उपजी खीज ,चिढ़ ,और गुस्सा ,आक्रोश कविता में उभर कर आया है ।यह क्रोध क्यों है ? बिस्तर की सलवटें साफ करते हुए भी मन में वर्तमान से कुछ बेचैनी है । वर्तमान हर बार मुट्ठियां कस कर मन को विकल कर रहा है ।कुछ गंदगी है ,कुछ साफ़ सुथरा और व्यवस्थित नहीं है । कहीं न कहीं व्यवस्था में झोल है ।समाज में कहीं न कहीं अच्छा होने के आश्वासन तो है लेकिन कुछ भी अच्छा और सुकून भरा नहीं है ।बार बार मन में सफाई करने का ख्याल तो करती हैं इच्छाएं लेकिन फिर भी सब कुछ साफ़ और बेहतर नहीं है यह देश की दशा व्याकुल किये हुए हैं । सब कुछ बेहतर और अच्छा कैसे किया जाये इसी के लिए चादर की सलवटें मिटाई जा रही है लेकिन इससे मकसद पूरा नहीं हो रहा है ।समाज में जो समस्याओं की सिकुड़न है वह नहीं मिट रही ? मकान के चारों ओर–” घूरे ” बढ़ रहे हैं ? यह कचरों का ढेर नहीं वरन समाज में व्याप्त कठिनाइयां और जीवन संघर्ष बढ़ने के संकेत हैं ? समाज में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है , समाज में अनैतिकता बढ़ रही है ,समाज में मंहगी शिक्षा का चलन बढ़ रहा है ? स्वास्थ्य और सेहत लाभ का धंधा बन चुका है । राजनीति भ्रष्ट और सत्ता अमानवीय हो चुकी है ।इस बिकाऊ राजनीति के भाषणों की बिछाते सड़कों पर बिछी हुई है ।यह सब मकान के चारों ओर याने आदमी की रहवास स्थितियां भी मनोनुकूल नहीं रह गई हैं ? यह दशा बहुत ही चिन्ता जनक है ? लालची और लोभ में डूबे अजगर की तरह लेटे फेक्ट्री के कर्मचारी नेता । आश्वासनों से भरे भाषण देते राजनेता , शिक्षा का प्रचार – प्रसार और हर एक के लिए शिक्षा का इंतजाम करने के संकल्प और रोजगार की बेहतर स्थिति पर का नतीजा सब के लिए भूखे रहने की भरपेट बेरोज़गारी । “सारा परिवार –भरपेट भूखा ” कविता की इन पंक्तियों में तंज है ।आक्रोश है । गुस्सा है ।क्रोध है । वर्तमान का यथार्थ है । क्या नहीं उभर कर आया है कविता में ? समग्र कविता आक्रोश का बयान भर है ।कमरे में बिछी पलंग की चादर की सलवटों के बहाने देश की हर समस्या और संघर्ष को उधेड़ा गया है । भ्रष्ट आचरण है फिर भी सत्य नारायण की कथा बांची जा रही है । यह सत्य नारायण की कथा भी प्रतीक है हमारे आचरण में समाये असत्य के रुप में ।हमारे पास घूरे के अम्बार लगे हैं ? यह घूरा भी मामूली नहीं है । राजनीति भटकी हुई है ,धर्म नफरत से भरा है , फैक्ट्री के नेता और मालिक के बीच सांठ – गांठ है , स्त्रियां बाजार के सामान की तरह बिखरी हुई और बिकाऊ है । मर्यादा की रस्सी खुली पड़ी है , नारे उछालती भीड़ है जो सच्चाई को नहीं जानती – समझती । सरकार का प्रचार तंत्र चेतना पर हावी है ।यह सब वर्तमान का यथार्थ है जिसके बीच फंसा – उलझा समाज साफ – सफाई की दरकार रखता है । लेकिन यह दरकार समझने वाले नागरिक चेतना और संवेदना से भरे नागरिक बहुत कम हैं ।बहुत कम चेतना सम्पन्न नागरिकों को अपने “कमरे “को साफ – सुथरा बनाने की चाह है ? यह चाह ही आदमी को अपने देश रुपी कमरे को साफ रखने की फिक्र है । कचरा तो साफ करना ही पड़ेगा ,देश भक्ति के नाम पर फैला पाखंड, रोजगार के नाम पर खाली पड़ें पद , शिक्षा के नाम पर व्यवसाय ,सेहत के नाम पर लूट ? सेना के नाम पर बिकाऊ – दिखाऊ विजय के खोखले इतिहास , यह सब हमारे समाज का कचरा है जिसे साफ करना ही पड़ेगा ।यह अवश्म्भावी है । यह आवश्यक और बेहद जरुरी गतिविधि है ।यह श्रम तो करना ही होगा हर नागरिक को हर देशवासी को । देश ही हमारा कमरा ,घर ,आवास,निवास है।इसे समझना बहुत बहुत जरुरी है ।
विनीता रघुवंशी
