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इस जंगल से उस जंगल तक
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बांस उस वक्त
खरा हो जाता है
जब वह हर जगह से फुंगस जाता है
नये कल्लो की धार लिए
तब, अपने भिड़ों में वह
सीटियां बजा – बजा कर गाता है
हवा को
कभी उंगली पकड़ाये
कभी गोद में बिठाये
कभी कंधों पर उचकाये झूमता है
उसकी हरी कच्च हंसी
इस जंगल से उस जंगल तक
दूब और पत्तों पर
पर्वत – दर – पर्त बिछ कर
बाग – बाग करती है उन्हें
लेकिन वही बांस
जब जगह – जगह से
चिटख जाता है
तो —-
तमतमा जाता है
अपने से सटे बांसों से
बात -बात में
उलझ – उलझ , भिड़ – भिड़ कर
भीतर दबी अपनी
आग की लपटें खोल देता है
जिससे
इस जंगल से
उस जंगल तक
दूब और पत्तों पर छाई
हरी कच्च मदहोश हंसी
दावानल की
लपटों में बदल जाती !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता में जंगल सत्ता का प्रतीक है और बांस मनुष्य का प्रतीक है । आग चेतना और क्रोध के रुप में प्रयुक्त हुआ है । वैश्वविक व्यवस्था और उसकी संवैधानिक स्थिति में अनुशासन की शिथिलता , अनाचार , अनियमितता से उत्पन्न अव्यवस्था से जंगल राज का अनुभव होना ही कविता का मर्म है ।बांस जंगल की वनस्पतियों में सदा हरा पन लिए होता है ।बांस जहां भी उगता है वहां वह भिड़ो में या झुण्ड मे उगता है । बांस जंगल की सुरक्षा में हर हमेशा तत्पर रहता है ।बांस चेतना वान है उसमें आग है , दरिया है , हवा है , और मिट्टी को बहने से बचाने की क्षमता है ।बांस संस्कृति से , संस्कारों से जुड़ी वनस्पति है ।मृत व्यक्ति की शैय्या है । बांस का जंगल अपने आप में अनुशासित होता है लेकिन उसकी जड़ों में आग दबी होती है ।जहां बांस के भिड़े होते हैं वहां अन्य वनस्पतियां अपनी हरियाली का प्रसार करती है ।जंगल रक्षित रहता है बांस के भिड़ों के साथ ।बांस में जब जंगल की अव्यवस्थाओं से गुस्सा फूटता है तो वह अपने आसपास उगे वृक्षों , पेड़ों के साथ उलझ उलझ जाता है ।जैसे जिस व्यक्ति को परिस्थितियों का बोध तो होता है लेकिन समाधान नहीं सूझता , कोई मददगार नहीं मिलता ,कोई सहयोगी नहीं मिलता तो वह उत्तेजित हो जाता है इसी तरह बांस भी जंगल की अनीयमितता से उत्तेजित है । बांस जंगल में मग्न है ।झूमता है ,हंसता है , सीटियां बजाता है ,जब बांस के भिड़ो के बीच से हवा सरसराती बहती है तो बांस से टकरा कर वह सीटियों सी अनुगूंज पैदा करती है । यह सब बांध के जंगल का सूक्ष्म निरीक्षण ही है ।जब भी हवा बांस के जंगल के बीच से अपनी गति से बहती है तब बांस की ऊंचाई के अनुपात में ऐसा प्रतीत होता है कि हवा ने बांस की उंगली पकड़ रखी है या हवा बांस की गोद में बैठी है या वह कभी कंधों पर। खेल और उचक रहीं हैं ।बांस हवा का बुजुर्गवार है ।दादा है या नाना ? बांस की छाया जंगल में दूर दूर तक दूर्वा और पेड़ों की पत्तियों को हरा भरा बनाए रखती है ।बांस है तो जंगल में सब कुछ अमन – चैन है । जब बांस जगह जगह से चिटख जाता याने जब वह महसूस करता है कि जंगल के हालात बेकाबू हो गये हैं और नियम कायदे सब टूट रहे हैं जंगल याने सत्ता अपने मनमाने ढंग से चल रही है तो फिर उसका खरापन ,उसकी चेतना जागृत होती है ।उसका दबा हुआ क्रोध बाहर आने लगता है ।फिक्रें ,चिन्ता सब व्याकुल करती है ।वह बात – बात में उलझने लगता है ? उसमें चेतना की आग सुलगने लगती है ।समाज का जंगली पन उसे आहत करने लगता है ? तब वह अपने भीतर की आग को प्रकट करता है ।पुरातन काल में बांस से भी अग्नि प्रज्वलित की जाती थी । यहां बांस चेतना वान नागरिक का भी प्रतीक बनकर आया है ।जिस व्यक्ति को वर्तमान हालात चिन्तित करते हैं वहीं अपने भीतर के क्रोध को बार बार विचारों में व्यक्त करता है ,बार बार जन समर्थन पाने की चेष्टा करता है और जनता की नासमझी पर आग बबूला होता है , उन्हें समझाने के लिए उन पर गुस्सा होता है , यही तो है अपने आसपास के सटे बांसों को समझाते समझाते उत्तेजित हो जाना ,उनके साथ वैचारिक मतभेद उत्पन्न होना , अपने विचारों की आग को सबके सामने उजागर कर देना । यही तो है चेतना का परिवर्तन जो दावानल बनकर जो कचरा है ,जो उच्छृंखल उन्माद है , जो हर सत्ता की अमानवीयता है , जो सत्ता का अन्याय है ,जो शोषण है , जो आम आदमी का संघर्ष है , उन सब को यहां से वहां तक अर्थात देश से देशान्तर तक के जंगल राज को संवैधानिक व्यवस्था के अन्दर समेट लेना ।यह आग सब कुछ स्वाह नहीं करती यह बिगड़ते हालातों को सुधारने और व्यवस्थित करने के लिए प्रकट होती है ।यह नागरिक चेतना रुपी बांस की आग है जो दावानल याने वैचारिक बदलाव के लिए अपनी लपटें चारों ओर बिखेर रही है ।जब वैचारिक बदलाव की आग फैलेगी तब जहां कहीं भी जंगल राज के लक्षण है वे सब इस आग रुपी दावानल में नष्ट हो जायेंगे । बांस हर संस्कार का अंग है और जंगल की रक्षा की सीमा है ।बांस में छुपी आग जंगल की मर्यादा की पर्याय है । बांस नियम ,विधि ,न्याय ,कानून का पहरेदार भी है । बांस का अपना वानस्पतिक चरित्र है ।जो अन्य वनस्पतियों से भिन्न है ।बांस पर्याय है आग ,पानी, हवा, और आसमान सी ऊंचाई का , धरती को ब़धन में रखने का । बांस है तो खरा है ,बांस है तो हरा है , बांस है तो तीखा है ,बांसुरी की मधुर ध्वनि है ।इस लिए हरित बांस की बांसुरी श्री कृष्ण की शोभा है ।
विनीता रघुवंशी
