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तलघर में
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(१ )
मुझे अक्सर –उसके घर के सामने से ही
आना – जाना पड़ता है
हर बार वह
रोम – रोम से मुस्कुराते हुए —
करता दण्डवत
और रोक कर जब तब —
करता खातिरदारी
कहते हुए ‘ मालिक यह सब कुछ है आपका ‘
करवाता सैर — कभी अपनी दुकान पर
मेरे पांवों को चरण बता –दबा दबा कर अपने भाग्य को सराहता
अब ,वह बिला नागा खिलखिलाकर मुझको
मोटा तगड़ा कर रहा है —
मैं सकुचा कर मना करता तो
मेरी मेहरबानी पर ही
अपनी जीविका चलने को कहने लगता
क्यों है ? उदार वह मेरे लिए इतना
आखिर मैं हो जाता सम्मोहित
रात दिन उसी के बारे में सोचते – सोचते
घबरा उठता हूं
मेरी घबराहट को हंसी में उड़ाते हुएं
आलिंगन में कसे — नापने लगता
मेरी जीभ की लम्बाई
रोचक ढंग से
एक शानदार खेल का विवरण शुरु करके
उसके महल पर मेरा आधिपत्य
प्रमाणित करते – करते ले जाता मुझे
भीतर बहुत भीतर
ट्यूब लाईट से जगमगाते
चालीसवें कमरे के बीचों बीच
(नोट : कविता का शेष अंश कल )
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
एक अदृश्य रोमांच भरी अनुभूति और रहस्यमय अनुभव के रचाव के बीच से गुजरती कविता— ” तलघर में ” यह तलघर का रहस्य और खातिरदारी करने वाला उदार हृदय शख्स कितना अद्भुत और विस्मय कारी है ।यह सिर्फ — ” जीभ की लम्बाई ” माप रहा है याने एक आम व्यक्ति की अभिव्यक्ति की ताकत का अन्दाज लगा रहा है । आम आदमी कितना अपनी तकलीफों को ,कष्ट को किस हद तक सहन कर सकता है । यह जांचने का काम हर वक्त सत्ता और सत्ता से जुड़े चापलूस,चाटुकार, प्रचार तंत्र ,सरकारी अधिकारी ,प्रशासक , करते रहते हैं ।यह चापलूसी जनता के साथ भी निभाई जाती है जनता को देश का मालिक माना जाता है ।वह संविधान की रखवाली करती है ।वह मतदाता बनकर सरकार का चुनाव करती है । इसलिए जो सत्ता तंत्र है वह जनता को ही अपना भाग्य विधाता मानता है ।सत्ता एक दुकान है जो अपने ग्राहक को लुभाती है ।उसे मुफ्त राशन, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा ,मुफ्त रोशनी , सब कुछ मुफ्त में देती है ।जनता ही सत्ता की माई – बाप है ।इस तरह आजादी के चालीस साल व्यतीत हो जाते हैं । वह जनता को तंत्र के भीतर बहुत भीतर तक पहुंचा देता है ।जनता हर वक्त सत्ता में बैठे नेतृत्व का चिन्तन करती है ।उसकी अच्छाई की खुशफहमी में खोई रहती है । नेतृत्व के गुण गान करती है ।नेतृत्व की उदारता जनता में घबराहट पैदा करती है ।सत्ता क्यों है ?जन के प्रति कल्याण भावना से ओत – प्रोत ? जन की घबराहट को हंसी में उड़ाते हुए वह जीभ की लम्बाई को नापता है ? सत्ता तब ही तक जन के प्रति माकूल है जब तक जन अपनी जुबान नहीं खोलता ? यह जुबान खोलना मतलब सत्ता की साजिशों , घोटालों, अन्याय , अमानवीय अत्याचार की खिलाफत नहीं करती तब तक जन सुरक्षित है ।सत्ता का समस्त वैभव ,समस्त संस्थान ,समस्त प्रचार तंत्र जन के अधिकार में ही है ।वह जन का विश्वास जीतना चाहता है और इसी जन विश्वास को वह अपनी सत्ता के खेल को जनता के साथ रोचक ढंग से खेलता है । जिसमें जन और जनता का विश्वास खेलते – खेलते चालीसवें कमरे तक पहुंच जाती है । यह चालीसवां कमरा क्या है ? इसका आशय है ? गणतंत्र के चालीस साल ? यहां आकर कविता एक रोमांच ? एक रहस्य ? एक विस्मय ? एक साज़िश ? एक षड्यंत्र ? लोकतंत्र का आशय उजागर करती है ।यह विचार करने वाला विषय है जहां आजादी की दिशा को भारतीय संस्कार और संस्कृति से पलट कर पश्चिम की ओर घेर दिया गया । जहां समाज की चेतना पश्चिम दिशा की ओर घुमा दी गई ।आज हमारा वर्तमान भ्रमित होकर विश्व व्यवस्था का दास बन गया ? यह चिन्तन ,समग्र चेतना के जागरण ,और नागरिक विचार बोध की ओर लौटने का वक्त है । तंत्र को गुलामी से मुक्त करने की जरुरत है ? हमारा इतिहास बोध फिर पुनर्जीवित होगा ? पुनर्जन्म होगा हमारी चेतना का ? यह चिन्तन और दृढ़ता के साथ अपने देश के साथ खड़े होने का समय है । ( कविता का शेष अंश कल )
विनीता रघुवंशी
