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जूता : अलग अलग सन्दर्भ
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( ४ )
सूरज को गलबहियां डाले
उसके खीसें से चबेना निकाल
दड़दडाते खिलखिलाते
चहलकदमियां करते
आदमी के बारे में —- तुमने कभी सोचा है ?
ऐसा ही होगा वह
जो अपनी ही
जीजिविषा के पांवों चलेगा
कितनी – कितनी रोशन होंगी यात्राएं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता में खासियत है कि वह देशज शब्दों से ध्वनियों का अनुरणन गुंजित करती है ।दड़दडाते ,खिलखिलाते , चहलकदमियां ये सब शब्दानुभूति कम और अनुरणन गुंजित ध्वनियां ज्यादा प्रतीत होती है । ध्वनियों के भीतर से आशय की परत दर परत खुलती जाती है । यहां समाज की उस कृत्रिम भौतिकता के आधार को एक चुनौती दी गई है ।आदमी खुद अपनी ताकत को महसूस करके अपनी इच्छाओं के साथ यात्रा करने लगेगा उस दिन उसके साथ सूरज की ऊष्मा होगी ,ऊर्जा होगी , सूरज का ताप होगा ।सूरज के साथ उसका दोस्ताना होगा ।आज वर्तमान में मनुष्य सूरज के ताप से घबराया हुआ है ।वह उससे बचने के लिए तमाम तरह के भौतिक संसाधन जुटा रहा है उसने सूरज से बचने के लिए कूलर ,ऐ सी , शीतल पेय, आदि पदार्थ खोजे और सूरज की तपन से किनारा कर लिया । धूप उसे काटने लगी , पसीना उसे दुर्गंध सा लगने लगा ,घर की ,भवन,की ठण्डी छांह मनुष्य के मन को भाने लगी ।इस तरह आदमी प्रकृति से दूर – दूर होता गया ।प्रकृति के साथ उसका सामंजस्य वाला रिश्ता टूट गया ?
यहां उस आदमी की कल्पना की जा रही है जो प्रकृति की प्रतिकूलताओं के बीच रहकर अपना तालमेल प्रकृति की ऊर्जा से जोड़ना चाहता है । कृत्रिम संसाधनों से मुक्त मनुष्य बिल्कुल प्राणियों , जीवों, पशु – पक्षियों की तरह ही होगा । वह अपनी जीने की इच्छा से जियेगा ।खुद पर भरोसा करके । कृत्रिम संसाधन से मुक्त अपनी ऊर्जा का अहसास लिये जीने वाला मनुष्य ही अपनी जैविक शक्तियों का इस्तेमाल खुद के लिए करेगा । मनुष्य के पास प्रकृति ने जो साधन या तन बल दिया है वह ब्रह्माण्ड की तरह ही अतुलनीय है — मनुष्य की ऊर्जा है त्वचा , बुध्दि, स्पर्श, रक्त संचरण , ( स्पन्दन ) और ध्राण ( सूंघने की शक्ति ) ये उसकी नैसर्गिक शक्तियां हैं ।इनकी उपेक्षा करके वह कृत्रिम संसाधनों पर अपने जीवन की ऊर्जा को स्थित करता है ।जबकि उसे यात्राओं के लिए कृत्रिम साधन जैसे बस,कार,हवाई जहाज ,जल वाहन , समुद्री जहाज आदि की बहुत जरुरत नहीं है ।वह अपनी यात्राओं को जीने की इच्छा के साथ जोड़ सकता है । मनुष्य के मन में अप्रतिम इच्छाएं हैं और इसके लिए वह एक वस्तु वादी संसार की संरचना अपने आसपास रच लेता है । इस संरचना में उलझा मनुष्य अपने जीने की मूल इच्छा से वंचित हो जाता है और केवल कृत्रिम इच्छाओं के साथ वह निरंतर भागता रहता है । जिस दिन मनुष्य अपनी जीवनेच्छा के आशय और अर्थ समझ जायेगा। उस दिन वह मुक्त होगा ।उसकी यात्राएं वैचारिक प्रकाश और ऊर्जा से भर जायेगी ।आज वर्तमान में मनुष्य अर्थ व्यवस्था ,धन, और बाजार के संकेतों पर अपनी यात्राएं सृजित करता है ।जिस दिन मनुष्य अपने वैचारिक विवेक को जागृत कर लेगा उस दिन उसकी यात्राएं स्वरुप ग्रहण करने लगेंगी । उसकी वैचारिक यात्राएं पराश्रित नहीं स्वावलंबन पर टिकी होगी ।आज मनुष्य का जीवन वस्तुओं के आश्रय पर स्थित और स्थिर है । वह चलते हुए भी कहीं नही पहुंच रहा है ।वह स्थिर है वस्तुओं के आसपास घिरे माहौल में , उसकी इच्छाएं अनवरत निर्जीव वस्तुओं में प्रकट होती है और अपने आसपास मृत संसार को लपेटे वह जीवित रहने का प्रयास करता है ।यह मनुष्य की विडम्बना ही है । वास्तविक जीजिविषा तो वस्तु विहीन संसार में ही रची – बसी है । मनुष्य को अपनी अन्तर ऊर्जा का अहसास ही मुक्त कर सकता है ।भौतिक संसार कृत्रिम संसार है ।इससे मुक्त मनुष्य ही वास्तविक ज्ञान पिपासु और जीवन की ऊर्जा का संचरण महसूस करने वाला है ।भौतिक जगत दासता है और प्रकृति के साथ उन्मुक्त भाव निर्विकार जीवन शैली है । मनुष्य के जीवन की वास्तविक मुक्ति वस्तु वादी संसार से बाहर आना ही मुक्त होना है ।
विनीता रघुवंशी
