7
तलघर में
*********
( २ )
महात्मा गांधी की मूर्ति के ठीक सामने पहुंचते हम
किस्सा खत्म करते हुए वह
मुझे कुछ दूर रख कर अहिंसा के देवता के
कल्याणकारी हाथ को जैसे ही छूता कि
खटा ऽ क की आवाज के साथ
जमीन वैसे ही अलग हो जाती
जैसे फांसी के फंदे के पटिए
एक खटके से झूल जाते हैं —
और
मैं ,अपने आपको नर कंकालों से भरे
तलघर में पाता हूं –सुनते हुए उसकी महाजनी आवाज़
” हुजूर घबराइये मत — जिबह से पहले
हार्ट अटैक कायरों का होता
या समझदारो का
आप तो शुरु से दोनों ही नहीं रहे “
मैं चीखता हूं — इन नरकंकालों से अलग करो मुझे
वह बोला
अपने ही समाज से नफरत और इतनी ऽ ऽ ऽ
सुनते हुए चक्कर आ गया — और मैं
तिर्र – भिर्र आंखों पर हाथ धरे
अपनी देह पर महसूसता हूं
धारदार पैनी- पजी हुई रांपी की कारस्तानियां
वह मुस्कुराता है फ़खृ के साथ –कहते हुए कि —
हुजूर चिन्ता न करें — आपके मुंह में डालने को
तुलसी पत्तर और गंगाजल दोनों मौजूद हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
“तलघर में” कविता सत्ता की क्रूरता के तिलिस्मी माहौल का चित्रण करती है । सत्ता तंत्र जनता के साथ जिस बर्बरता का व्यवहार करती है वह रहस्य होते हुए भी बहुत विश्वसनीय हो जाता है । सत्ता तंत्र ने अहिंसा के देवता का हाथ मूठ की तरह इस्तेमाल किया और जन के साथ छल- कपट,धोखा करके वह फ़खृ ( गरिमा ) महसूस कर रही है ।यह सत्ता तंत्र महाजनी तंत्र है । जहां जन की हैसियत कुछ नहीं है । वह तो है ही इसलिए कि सत्ता उसका उपयोग नर कंकाल बनाने के लिए करें ।यह नर कंकालो का समाज कविता में एक व्यंग्य ,तंज ,और आक्रोश के रुप में हुआ है ।हमारा समाज भी वास्तव में नर कंकाल की तरह ही है । यहां नागरिक बोध नहीं जागता ,यहां चेतना नहीं जागती , यहां काटो,बांटों, आगजनी ,हिसा,दंगा, फसाद के विचार में जन फंसा हो वहां जीवन चेतना और एकता का माहौल कैसे रचा जा सकता है । जिस समाज में नफरत,द्वेष,,हिंसा के भाव कूट- कूट कर भरे हों वह समाज सिर्फ कंकालों का ही समाज है ।जिस समाज में राष्ट्र के लिए निष्ठा न हो ,समर्पण न हो ,ईमान न हो, जहां का हर नागरिक केवल अपने हित साधन में जुटा हो ? वह समाज चेतना वान ,जीवित, और संवेदनशील कैसे हो सकता है ।जिस देश में रिश्वत, भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह स्वीकार कर लिया गया हो वह समाज कंकालों का समाज ही तो है ? जो समाज के अधिकारी, प्रशासकीय अमला देश के धन को अपनी सम्पत्ति मान कर हड़प रहे हों वह समाज तो नर कंकालों का ही समाज है । कहां गई महात्मा गांधी द्वारा लाई गयी आजादी की चेतना वह जागृति अपने समाज के लिए वह राजनीतिक नैतिकता और राजनीतिक मूल्य चेतना । क्यों आज दोयम दर्जे का नेतृत्व हम पर शासन कर रहा है ? क्या हम सचमुच में जीवित कहलाने लायक हैं ? ये अपने आपको टटोलने का समय है ।अपने आपसे सवाल पूछने का समय है । क्यों उस राजनीतिक व्यवस्था के हम दास हैं जो महाजनी सभ्यता पर अहिंसा का चोला ओढ़े हुए है ? हम में अपने देश के प्रति कोई लगाव नहीं ? हम में अपने देश की समस्याओं के समाधान का जज़्बा नहीं ? यह देश तलघर में तब्दील हो चुका है और हम सब तलघर में रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं ।हम मुक्त होकर भी यथास्थिति के बंदी हैं ।जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दो ।एक निराशा भरे माहौल की कैद में बन्द तलघर ।यह तलघर हम सबके भीतर भी है और देश को भी हमने तलघर में बदल डाला है । जहां कुन्द विचार ,भय ,डर की हवा फैली हुई है । हम बंटे हुए हैं जाति ,छोटे – छोटे समूह, समुदाय में लेकिन हम सब भारतीय हैं यह परिचय हम भूल चुके हैं ।भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता ही है अनेकता में एकता । समाज इस भारतीय संस्कृति की चेतना को भूल गया और छोटे छोटे जाति समूह में धड़ों में बिखर कर अपने जीवन अस्तित्व को खोजने के लिए भटक रहा है । यह वैचारिक अन्धकार का तलघर है । जिसमें हर एक जन की मृत्यु अलग – अलग है ।सत्ता तंत्र आदमी के अकेले अस्तित्व को सरलता से मिटा सकता है ।चेतना की वैचारिक एकता जीवन के अस्तित्व को आसानी से मिटा नहीं सकती । यही तो एकता की संवेदनशीलता, वैचारिक सोच समझ और आपसी नफरत के दायरों को मिटाना ही पहली प्राथमिकता होना चाहिए हमारे समाज की ।तब हम हिंसा के तलघर से बाहर अंधेरे से रोशनी में आ पायेंगे ।तलघर के गहरे आशय को हमें समझना चाहिए । जहां जहां भी हमारी वैचारिक कमजोरी है वहां वहां हम तलघर में रहते हुए भी केवल कंकाल भर हैं ।केवल सांस लेते हुए बिना प्राण । प्राण का अर्थ ही है जीवन । अपना आत्म बोध नहीं ,समय का बोध नहीं ,चेतना का बोध नहीं ,जीवन बोध नहीं तो फिर प्राण कहां ?
विनीता रघुवंशी
