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अनंत को लेकर – आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
अनंत को लेकर
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( १ )
तुम्हारे पास वह सब है
जिसका तुम्हें अन्दाज तो होना ही चाहिए
एक बहुत बहुत गहरा जलाशय
तुम्हारी आंखों में समाना चाहता
उसे तुम्हारी
गुनगुनी पलकों के सिवाय
कुछ भी नहीं चाहिए
छरहरी डाल पर झूमता गुलाब
तुम्हारे अधरों को दर्पन बनाना चाहता
अपनी ही प्रतिच्छवि के सिवाय
कुछ भी नहीं चाहिए
ऐसे में कब तक
बेखबर होने का
अभिनय करते रहोगे मेरे अनंत !
अब तुम्हें
मिलन की इस हक़ीक़त की
एक आवाज तो होना ही चाहिए
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
अनंत एक उद्गार है । प्रणय निवेदन है । प्रिया के उस अपरुप का अहसास है ।अनुभूति की गहराई को छूकर निकला अनुभव है प्रेम का ।प्रेम देह नहीं है ।देह के भीतर छुपी वह आत्मानुभूति है जिसका स्मरण प्रणय निवेदन में किया गया है ।प्रिया अपने दैहिक सौन्दर्य से बेखबर है ।अनजान हैं ।उसका तन्वंगी होना । उसके गुलाबी से कोमल अधरों में छुपी अमृत की रसधारा का प्रेम भरे अनुभव से वह अपरिचित हैं । प्रेम की गहरी अनुभूति तब ही संभव है जब यह प्रेम परस्पर महसूस किया जाये ।प्रिया यहां अपने प्रेम के प्रति अबोध और अनजान हैं ।उन छवियों के प्रति भी वह अजनबी है जिनके द्वारा प्रेम का प्रदर्शन, आकर्षण और चित्त को मोहित किया जा सकता है ।प्रेम अपनी ही आकर्षक छवियों से परस्पर चित्त को आकर्षित करता है । यहां प्रिय प्रिया को आंगिक मुद्राए और चेष्टाओं के भीतर छुपे प्रेम के अहसास का अनुमान करने की क्षमता की सीख दे रहा है ।प्रिया वयस्क है लेकिन अपनी देहानुभूति से अनजान हैं । ” तुम्हारे पास वह सब है ” याने देह का आकर्षण है ।देह का सौन्दर्य है । मुद्राएं हैं और आंगिक चेष्टाएं भी हैं लेकिन उनके प्रति जो सादगी,जो निर्मलता, जो बोध शून्यता है जो निर्विकार भाव है उससे बाखबर करते हुए यह प्रणय निवेदन कितना सार गर्भित हो गया है । यहां प्रिया है लेकिन उसके मनोभाव में विकार नहीं है ।उसके मन में यौवन का अहसास जगाने वाला प्रणय निवेदन है यह ।अपनी देहानुभूति से परिचित कराने वाला प्रणय निवेदन है यह ।यह प्रणय निवेदन बिल्कुल अद्भुत और विस्मय कारी है ।इस प्रणय निवेदन में प्रिया से मांग,चाह,कामना भी बहुत ही अनूठी है ।केवल स्पर्श की चाह ।केवल मिलन का प्रतिस्वर ,प्रति आवाज , यह कितनी अनोखी चाह है ।यह प्रेम एक तरफा नहीं वरन परस्पर चाहिए ।प्रेम की अनुभूति की चेतना तो हो लेकिन यह चेतना परस्पर प्रौढ़ होनी चाहिए ‌वैचारिक होनी चाहिए ।अब प्रेम की स्वीकृति की आवाज चाहिए ।यह चाह बहुत निर्विकार है । परस्पर प्रेम की कामना निष्कलुष है । प्रिया को लड़कपन से प्रौढ़ बनाता यह प्रणय निवेदन कितना अचरज भरा है ।इसका अनुमान और अन्दाज किया जा सकता है । एक यौवन प्राप्त प्रिया के पास सब कुछ है । प्यार है ,लगाव है ,आत्मीयता है ,चिन्ता है ,फिक्र है ,बेकरारी है , बेचैनी है । सब कुछ है जो प्रेम करने की अनुकूलता है वह सब भी है ।लेकिन मन निश्चल है ।मनोविकार से रिक्त है । मन में चंचलता नहीं है । इस मन को प्रेम की चंचलता ,चपलता से भर देना ही प्रणय निवेदन का गहरा और अनूठा मर्म है ।अनंत याने एक अन्त हीन सिलसिला प्रणय का ,प्रेम का ,लगाव का ,आत्मीयता का , ममत्व का ,काल और काल से रहित प्रेम । 🙏 विनीता रघुवंशी

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