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अनंत को लेकर
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( २ )
अपने चमचमाते सूरज और
बन्द तहखाने
एक साथ फैला दिये तुम्हारे सामने
लेकिन तुम — दांतों से नाखून कुतरते
दूर उस पहाड़ी पर आंखें गड़ाये बैठे हो
चलो अब हम
उस पहाड़ी तक चल कर
एक दूसरे से
सूरज और तहखानों के अर्थ समझें
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
प्यार एक ऐसी शय है जहां आदमी पहुंचकर अपने आपको विकार विहीन बना लेता है ।प्रेम की वास्तविक दशा ही निष्कपट होती है । प्रणय निवेदन के दौरान प्रिय का यह कथन बहुत ही विश्वसनीय और चेतना से भरा है कि चमचमाते सूरज और बन्द तहखाने फैला दिये तुम्हारे सामने । वह कौन से सूरज हैं ?जो प्रिया के सामने उजागर हैं ।यह सूरज हैं अपने गुणों के ,अपनी प्रतिभा के ,अपनी सामर्थ्य के , अपनी क्षमता के , अपने भरोसे और विश्वास के ,अपनी आस्था और श्रद्धा के , अपनी करुणा मयी चेतना के ,अपनी संवेदना के ,अपने ज्ञान और सत्य के ,अपनी धारणाओं और संज्ञान के ,अपने प्रेम की आत्मानुभूति के । इन सब चमचमाते रोशनी से भरे सूरज प्रेम निवेदन में पसरे पड़े हैं प्रिया के सामने ? प्रेम की इतनी निष्कलुष अवस्था ? यह विचारणीय है । यहां भरोसा दिलाया जा रहा है अपने प्रेम संबंधों के निर्वाह का ।छल हीन प्रेम का । जहां केवल प्रकट है विश्वास ? जहां केवल चाह है प्रेम की सच्ची चेतना की ? यह कितना अनूठा विश्वास का तरीका है जहां चमचमाते सूरज याने रोशन ख्याल ! मानवीय धारणाएं वह चेतना जिसमें प्रेम ही प्रेम है । प्रगाढ़ प्रेम की आत्मानुभूति ही तो वह सूरज है जो जहां से भी चखा जाये मिसरी की तरह मीठा ही है । अपने गुण और अपने अवगुण ,अपने रहस्य ,अपनी अमानवीय धारणाएं और विचार ,अपने भीतर छुपी चतुराई। और अपने भीतर छुपे विकार ये सब बन्द तहखाने हैं । मनुष्य में एक ओर चेतना के मानवीय पक्ष हैं तो दूसरी ओर वह दुनियादारी है जो मनुष्य को सचेत रहने की ,सतर्क रहने की ,सजग होने की सीख देती है ।वह दोहरा पन देती है जो दुनियावी छल ,कपट, धोखों से सावधान होने की ताकीद करती है । ये मनुष्य की कमजोरियां भी हो सकती है ।झूठ बोलना , आचरण में समाये अवगुण , प्रदर्शन ,धोखा ये सब भी मनुष्य के बन्द तहखाने हैं जहां मन का चोर छुपा होता है । लेकिन एक प्रेमी का इस तरह अपनी कमजोरियों और सामर्थ्य को अपनी प्रिया के सामने प्रकट कर देना उन्हें स्वीकार करना ।कितना – कितना भरोसे भरा है ।यह प्रिय का दुस्साहस और हौंसला ही है ।वरना आज के प्रेमी में इतना साहस ही नहीं होता कि वह अपनी कमजोरियों को अपनी प्रिया के सामने प्रकट कर दे । यह भी कितना सार्थक रवैया है कि चलो अब हम उस पहाड़ी पर चल कर अपने सूरज और बन्द तहखानों के अर्थ समझें ? सचमुच प्रेम की पारस्परिक अवस्था तो एक दूसरे से गहरी पहचान ,गहरे परिचय की ही मांग करती है ।एक दूसरे के गूण और अवगुण का खासा परिचय ,जानकारी ही प्रेम को प्रगाढ़ करती है ।यह जानना जितना ही गहरा होता है समीपता भी बढ़ती जाती है ।यह मन ,आत्मा संवेदना और चेतना की पहचान से उपजा प्रेम है ।यह गुणों का असर होता है तन देह तो परे रहती है ।यह आत्म ज्ञान को पहचानना होता है । इसलिए ऐसा लगाव,ऐसा प्रेम ,ऐसी आत्मिक अवस्था ही वास्तविक प्रेम है ।पहल इसी प्रेम की सच्ची अनुभूति को पाने के लिए है ।प्रिया से इतने गहरे प्रेम के सरोकार हैं जो आत्मा से फूटते हैं । यह प्रणय निवेदन भी विशिष्ट है ।यह परस्पर भरोसे से उपजा प्रेम है । यही प्रेम सार्थक प्रेम है ।
विनीता रघुवंशी
