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अनंत को लेकर
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( ३ )
तुम, जब भी
मेरे पास आते
सीमाएं तुमसे जलती हैं
लेकिन तुमने कभी यह भी देखा —
कि वे मोम की तरह
कितने जल्दी – जल्दी पिघलती हैं
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
प्रिय और प्रिया के मिलन की स्थितियों के बीच खड़ी होती हैं सामाजिक मर्यादाएं ,समाज के विचार , मान्यताएं , और धारणाएं , आस्थाएं ,लोक व्यवहार , लोकाचार , परिवेश ,परिजन ,,माता – पिता यही सब तो है सीमाएं । जो समाज की वैवाहिक संस्था का ताना – बाना बुनती है । जहां विवाह पूर्व के प्रेम को अमर्यादा की श्रेणी में गिना जाता है । यही तो वे सीमाएं और धारणाएं हैं जो प्रेम की अवस्था पर रोक लगाती हैं लेकिन यही सीमाएं जब महसूस करती हैं कि यह प्रेम वैचारिक प्रेम है तो वह अपनी मर्यादा की कठोरता को नरम भी कर लेती हैं । यहां प्रेम का आकर्षण ही वह आग है ,वह उष्मा है जो प्रिय मिलन की उत्कण्ठा को सर्व स्वीकृत बना देती है । प्रेम का दैहिक स्वरुप भले ही त्याज्य हो लेकिन प्रेम की वैचारिक अवस्था हर हमेशा समाज में स्वीकृत मानी जाती है । प्रेम के लिए उम्र और सम्पत्ति की जरुरत नहीं होती उसके लिए तो मन में ,चित्त में ,आत्मा में ,चेतना में प्रेम का होना जरुरी होता है । यही अवस्था प्रेम की वैचारिक अवस्था है ।यह मिलन का एक दृश्य है जहां सीमाओं के पिघलने का अहसास है । प्रेम के सच्चेपन के सामने सभी मर्यादा अपने आप अपनी कठोरता ,अपना अनुशासन सब कुछ छोड़ देती है ।यह है प्रेम जैसे सार्वभौमिक तत्व की ताकत । घनानंद ने इसीलिए कहा है — “अति सूधो सनेह को मारग है, जहां नेकु सयानप बांक नहीं ” जिस पर बिना चतुराई के चलना ही प्रेम है ।
विनीता रघुवंशी
